नेशनल कांफ्रेंस के दिग्गज नेता फारुख अब्दुल्ला एक बार फिर अपने बयानों को लेकर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने पाकिस्तान को कश्मीरियों का रक्षक बताकर नया विवाद खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि दशकों से आतंकवाद झेल रहे कश्मीर में पाकिस्तान की पैरवी क्यों की जा रही है?
ओआईसी और फारुख की तालमेल बगदाद में 17-18 अक्टूबर 2026 को हुए ओआईसी के सम्मेलन में पाकिस्तान ने फिर कश्मीर का मुद्दा उठाया। भारत ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए इसे पाकिस्तान का एजेंडा करार दिया। इसके ठीक छह दिन बाद, 24 अक्टूबर को बारामूला में फारुख अब्दुल्ला ने कहा कि शहबाज शरीफ कश्मीर का मुद्दा उठाकर कश्मीरियों की हिफाजत कर रहे हैं। इस बयान की टाइमिंग ने कई राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं।
दिल्ली से अविश्वास, पड़ोसी पर नरम रुख? बारामूला की रैली में फारुख ने दिल्ली पर निशाना साधते हुए पूछा, क्या वहां से न्याय की उम्मीद की जा सकती है? उन्होंने कश्मीरियों को अपने अधिकारों के लिए लड़ने की चेतावनी दी। भारत सरकार से नाराजगी एक लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है, लेकिन केंद्र के प्रति अविश्वास जताने के लिए पाकिस्तान को सही ठहराना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय है। क्या कश्मीर के हित और पाकिस्तान के हित एक ही हैं?
परमाणु बम का डर और पीओके पर चुप्पी फारुख के बयानों का इतिहास रहा है। मई 2024 में जब भारत ने पीओके की वापसी की बात कही, तो फारुख ने पाकिस्तान के परमाणु बम का खौफ दिखाया। 2017 में उन्होंने पीओके को पाकिस्तान का हिस्सा मानकर भारत के दावे पर ही सवाल उठा दिए थे। आलोचकों का तर्क है कि भारत सरकार की नीतियों का विरोध करना एक बात है, लेकिन युद्ध के डर से या परमाणु हथियारों के हवाला देकर देश की संप्रभुता से जुड़े दावों को कमजोर करना गंभीर मामला है।
आतंकवाद पर दोहरा रुख फारुख अक्सर आतंकवाद की निंदा करते हैं, लेकिन जब बात पाकिस्तान की आती है तो उनका लहजा नरम हो जाता है। उन्होंने यह भी कहा था कि जब तक भारत-पाकिस्तान के संबंध नहीं सुधरते, कश्मीर में आतंकवाद खत्म नहीं होगा। सवाल उठता है कि जो देश सीमाओं पर लगातार खून बहा रहा है, उसे रक्षक की संज्ञा देना कश्मीरी जनता के घावों पर नमक छिड़कने जैसा क्यों नहीं है?
विवादास्पद बयानों की लंबी फेहरिस्त मई 2025 में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर उनकी टिप्पणी If it happened, so be it ने देश को झकझोर कर रख दिया था। हालांकि बाद में उन्होंने सफाई दी और खुद को भारतीय बताया, लेकिन उनके बयानों का विरोधाभास उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है।
फारुख अब्दुल्ला को लोकतांत्रिक दायरे में पूर्ण राज्य के दर्जे या अनुच्छेद 370 पर बहस करने का हक है। लेकिन जब वे पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय मुहिम को कश्मीरियों की सुरक्षा से जोड़ते हैं, तो उनकी निष्ठा पर सवाल उठना लाजिमी है। क्या कश्मीर की राजनीति का भविष्य दिल्ली के साथ होगा या फिर पाकिस्तान के इशारों पर चलने वाली एक सुरक्षित राह की तलाश में?
*Baramulla, Jammu and Kashmir: National Conference President Farooq Abdullah says, They are completely independent. When I saw those documents, what can you expect from Delhi? Do you expect them to deliver justice for you? Have the courage to fight, or you will be wiped out, and… pic.twitter.com/izQ2j5p0Ci
— IANS (@ians_india) October 24, 2026
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