गरीबी के दलदल से राष्ट्रपति भवन तक: लुइज इनासियो लूला ने चौथी बार रचा इतिहास
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ब्राजील की राजनीति में लुइज इनासियो लूला डा सिल्वा एक ऐसा नाम बन चुके हैं, जिसे नजरअंदाज करना असंभव है। तमाम उतार-चढ़ाव और संघर्षों को पार करते हुए लूला ने एक बार फिर राष्ट्रपति चुनाव जीतकर चौथी बार देश की कमान अपने हाथों में ली है। उन्होंने अपने दक्षिणपंथी प्रतिद्वंद्वी फ्लेवियो बोलसोनारो को एक कड़े मुकाबले में मात दी है।

विवादों के बीच हुई वोटिंग

रविवार (25 अक्टूबर 2026) को संपन्न हुए इस चुनाव में काफी गहमागहमी रही। मतदान के दौरान बस सेवाओं में कटौती और भारी बारिश जैसे मुद्दों ने चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित किया, जिसके चलते लूला और बोलसोनारो दोनों ही गुटों ने वोटिंग का समय बढ़ाने की मांग की थी। इस घटनाक्रम ने लूला की जीत पर कुछ सवाल और चर्चाएं भी पैदा कीं, हालांकि अंतिम परिणाम उनके पक्ष में रहे।

लोकतंत्र की रक्षा सबसे बड़ी जीत

जीत के बाद लूला ने अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा कि यह लोकतंत्र की जीत है। उन्होंने जोर देकर कहा, हम लोगों को यह समझाने में सफल रहे कि लोकतंत्र को बचाने के लिए मतदान अनिवार्य है। ब्राजील किसी की जागीर नहीं है, हम देश के कामकाज के तरीके में बदलाव लाएंगे और आम जनता की भागीदारी सुनिश्चित करेंगे।

फर्श से अर्श तक का प्रेरणादायक सफर

लूला का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। 1945 में जन्में लूला का बचपन घोर गरीबी में बीता। 10 साल की उम्र तक शिक्षा से दूर रहे लूला ने पेट पालने के लिए जूते पॉलिश किए और मूंगफली बेची। 14 साल की उम्र में फैक्ट्री में मेटलवर्क का काम शुरू किया, यहीं से उनके भीतर राजनीतिक चेतना जगी। मिलिट्री शासन के खिलाफ आंदोलन करने के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

जड़ों से जुड़ाव ही लूला की ताकत

जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने वर्कर्स पार्टी की स्थापना की। 2002 में ब्राजील के पहले श्रमिक वर्ग से आने वाले राष्ट्रपति बने लूला ने अपने पिछले कार्यकालों में लाखों लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकाला। जानकारों का कहना है कि लोग लूला से इसलिए जुड़ाव महसूस करते हैं क्योंकि वे आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं।

जेल से सत्ता तक का कांटों भरा रास्ता

लूला का राजनीतिक सफर विवादों से भी घिरा रहा। 2017 में उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों में सजा सुनाई गई और 580 दिन जेल में बिताने पड़े। बाद में अदालत ने न्यायाधीश के पक्षपाती होने की बात मानते हुए उनकी सजा रद्द कर दी। रिहाई के बाद लूला ने फिर से अपनी राजनीतिक पारी शुरू की और बोलसोनारो के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा खड़ा किया।

80 की उम्र में नई चुनौती

अब 80 वर्ष की आयु में लूला दुनिया के सबसे उम्रदराज राष्ट्रपतियों में से एक बन गए हैं। अपने पिछले शासन के दौरान आई चुनौतियों और मतदाताओं की उम्मीदों के बीच, लूला के सामने अब ब्राजील की अर्थव्यवस्था और देश की संप्रभुता को सुरक्षित रखने की बड़ी चुनौती है। देखना यह होगा कि सत्ता की यह चौथी पारी उनके लिए क्या नया बदलाव लाती है।

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