CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आज देशव्यापी मोर्चा ; 200 संगठनों का प्रदर्शन, BJP की जवाबी पदयात्रा
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मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर देश में सियासी तापमान चरम पर है। आज, 23 अक्टूबर को 200 से अधिक संगठनों का गठबंधन पीपल अगेंस्ट SIR सड़कों पर उतरने की तैयारी कर चुका है।

आंदोलन की मुख्य मांगें और नारा गठबंधन ने हर हाथ में तिरंगा, हर गली में जंतर-मंतर का नारा दिया है। प्रदर्शनकारियों की दो प्रमुख मांगें हैं: SIR प्रक्रिया को तत्काल रद्द किया जाए और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें। आंदोलनकारियों का तर्क है कि मौजूदा प्रक्रिया लोकतांत्रिक मानकों के अनुरूप नहीं है।

दिग्गज चेहरों का समर्थन इस प्रदर्शन को कई प्रभावशाली लोगों का समर्थन मिल रहा है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति और राजनीतिक अर्थशास्त्री पराकला प्रभाकर ने इसमें सक्रिय भागीदारी का ऐलान किया है। उनके अलावा अभिनेता प्रकाश राज, वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण, किसान नेता राकेश टिकैत, सामाजिक कार्यकर्ता तुषार गांधी और छात्र नेता आईशे घोष जैसे चर्चित चेहरे भी इस मुहिम का हिस्सा हैं।

कैसे बना पीपल अगेंस्ट SIR ? 14 अक्टूबर को दिल्ली में हुई एक आपात बैठक में छात्रों, किसानों, मजदूरों, दलितों और अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधियों ने मिलकर यह मंच तैयार किया। आयोजकों का लक्ष्य इस विरोध को केवल दिल्ली तक सीमित न रखकर पूरे भारत में फैलाना है।

दिल्ली में सुरक्षा और पाबंदियाँ राजधानी में स्थिति तनावपूर्ण है। नई दिल्ली में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू है, जो बिना अनुमति किसी भी सभा या प्रदर्शन पर रोक लगाती है। हाल ही में हुए प्रदर्शनों के दौरान हजारों लोगों की गिरफ्तारी और हिरासत को देखते हुए, आज प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति बन सकती है।

BJP का जवाबी हमला विपक्ष के इस जन-मार्च का मुकाबला करने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। पार्टी 23 से 31 अक्टूबर तक राष्ट्रव्यापी अभियान लोकतंत्र बचाओ, भीड़तंत्र हटाओ चला रही है। BJP देशभर के हर जिले में पदयात्राएं निकालेगी, जिनमें प्रति यात्रा 10 हजार लोगों को जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही, पार्टी प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर अपना पक्ष मजबूती से रखेगी।

अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासनिक कड़े पहरे के बीच ये संगठन अपना मार्च निकालने में कितने सफल होते हैं और BJP का जवाबी अभियान इसे किस हद तक बेअसर कर पाता है।

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