मुंबई में आज दशहरा शक्ति प्रदर्शन: दो मैदान, दो गुट और सुरक्षा का अभेद्य घेरा
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मुंबई आज राजनीतिक सरगर्मी के केंद्र में है। शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट और एकनाथ शिंदे गुट की दशहरा रैलियों के लिए शहर पूरी तरह तैयार है। दोनों गुट अपनी ताकत दिखाने के लिए पूरी तरह जुट गए हैं, जिससे मुंबई में एक बार फिर राजनीतिक पारा चढ़ा हुआ है।

शिवाजी पार्क बनाम नेस्को सेंटर उद्धव ठाकरे अपनी पुरानी परंपरा को कायम रखते हुए ऐतिहासिक शिवाजी पार्क में रैली को संबोधित करेंगे। वहीं, एकनाथ शिंदे गुट ने इस बार गोरेगांव के नेस्को कॉम्प्लेक्स (वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे) को अपना मंच चुना है। दोनों ही स्थानों पर राज्य भर से कार्यकर्ताओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो चुका है।

शिंदे गुट का सादगी भरा संदेश शिंदे गुट ने इस साल अपनी रैली में बड़ा बदलाव किया है। सूखे की मार झेल रहे महाराष्ट्र के किसानों के प्रति संवेदना जताते हुए, उन्होंने सांस्कृतिक कार्यक्रमों को रद्द कर दिया है। इस बार रैली का मुख्य जोर केवल भाषणों पर होगा और कार्यक्रम को दो से ढाई घंटे में सीमित रखने की योजना है। बचा हुआ पैसा सूखाग्रस्त किसानों की मदद के लिए दिया जाएगा।

सुरक्षा का अभेद्य घेरा शहर में भारी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं। शहर की सड़कों पर 12,449 पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं। इसके अलावा 6 अतिरिक्त पुलिस आयुक्त, 20 पुलिस उपायुक्त और 45 सहायक पुलिस आयुक्त सुरक्षा की निगरानी करेंगे। साथ ही, एसआरपीएफ की 33 प्लाटून और क्यूआरटी की टीमें भी मुस्तैद हैं।

ट्रैफिक प्रतिबंध और छूट यातायात पुलिस ने 20 अक्टूबर को सुबह 9:00 बजे से रात 11:55 बजे तक विशेष ट्रैफिक इंतजाम किए हैं। भीड़ के कारण होने वाले जाम से बचने के लिए वाहनों की आवाजाही को नियंत्रित किया गया है। हालांकि, एम्बुलेंस, स्कूल बस, सरकारी वाहन और आवश्यक वस्तुओं (दूध, सब्जी, पानी टैंकर) को ले जाने वाले वाहनों को प्रतिबंधों से पूरी तरह छूट दी गई है।

राजनीतिक वर्चस्व की जंग शिवसेना की दशहरा रैली की परंपरा बालासाहेब ठाकरे ने शुरू की थी। पार्टी के विभाजन के बाद यह दूसरा मौका है जब दोनों गुट अलग-अलग रैलियां कर रहे हैं। आज रात तक यह स्पष्ट हो जाएगा कि किस गुट की सभा में अधिक भीड़ जुटी और दोनों नेताओं के भाषणों से भविष्य की राजनीति की क्या दिशा तय होती है। राजनीतिक जानकारों की नजरें दोनों रैलियों में शिवसैनिकों की संख्या और नेताओं के तीखे बयानों पर टिकी हैं।

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