आंदोलन के चर्चित चेहरे: क्या भीड़ की ताकत वोट में बदल सकती है?
News Image

आंदोलन की सफलता अक्सर उमड़ी भीड़ और उसके तेवर से मापी जाती है। किसान आंदोलन हो, भ्रष्टाचार विरोधी लहर हो या आरक्षण की मांग—इन आंदोलनों ने कई युवाओं को रातोंरात राष्ट्रीय पहचान दिलाई। लेकिन जब इन चेहरों ने मुख्यधारा की चुनावी राजनीति में कदम रखा, तो हकीकत कुछ और ही निकली। क्या आंदोलन का सुपरस्टार होना चुनावी जीत की गारंटी है?

जेपी आंदोलन: एक सफल विरासत 1974 के जेपी आंदोलन से निकली पीढ़ी राजनीति की सबसे बड़ी लाभार्थी रही। लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान और सुशील कुमार मोदी जैसे नेता इसी आंदोलन की उपज थे। इन नेताओं ने न केवल चुनावी राजनीति में सफलता पाई, बल्कि अपनी पार्टियां बनाईं और राज्यों व केंद्र की सत्ता संभाली। हालांकि, आगे चलकर इनकी विचारधाराएं और रास्ते पूरी तरह अलग हो गए, लेकिन आंदोलन ने इन्हें एक मजबूत राजनीतिक आधार जरूर दिया।

अन्ना आंदोलन और केजरीवाल का उदय 2011 के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाकर इतिहास रचा। उन्होंने आंदोलन की ऊर्जा को संगठन की ताकत में बदला और दिल्ली में लगातार तीन बार सत्ता हासिल की। हालांकि, उनकी पार्टी का हालिया सफर यह दिखाता है कि सत्ता के समीकरण समय के साथ बदल जाते हैं। दूसरी ओर, इसी आंदोलन से जुड़े प्रशांत भूषण, किरण बेदी और योगेंद्र यादव की राजनीतिक राहें बिल्कुल अलग रहीं, जो यह दर्शाता है कि एक मंच से शुरू हुए लोगों की मंजिलें एक नहीं होतीं।

आंदोलन के हीरो और चुनावी हार कन्हैया कुमार और राकेश टिकैत जैसे नाम इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। जेएनयू से निकले कन्हैया कुमार ने दो लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन दोनों बार उन्हें हार का स्वाद चखना पड़ा। वहीं, किसान नेता राकेश टिकैत ने जब भी चुनावी भाग्य आजमाया, उनकी जमानत जब्त हो गई। हरियाणा के गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने भी पार्टी बनाई, लेकिन उन्हें भी चुनावी सफलता नहीं मिली। इन उदाहरणों ने साबित कर दिया है कि मीडिया की सुर्खियों में रहने वाली लोकप्रियता और ईवीएम के बटन दबवाने की ताकत में एक गहरा अंतर है।

स्थापित दलों का सहारा ही एकमात्र रास्ता? हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी जैसे युवा नेताओं ने आंदोलन के बाद चुनावी सफलता तो पाई, लेकिन इसके लिए उन्हें स्थापित राजनीतिक दलों (भाजपा या कांग्रेस) का हाथ थामना पड़ा। यह दिखाता है कि बिना किसी मजबूत संगठनात्मक ढांचे के, आंदोलन की इंडिविजुअल पहचान राजनीति के मैदान में टिक नहीं पाती।

निष्कर्ष: नारे बनाम यथार्थ हाल ही में नेहा वोरा की चर्चा और राहुल गांधी द्वारा उन्हें दी जा रही अहमियत ने फिर से यही सवाल खड़ा किया है। आंदोलनों के नारे और आदर्श अक्सर चुनावी राजनीति के सोशल इंजीनियरिंग और स्थानीय समीकरणों के आगे फीके पड़ जाते हैं। जो नेता भीड़ की नब्ज पहचानने के साथ-साथ व्यवहारिक राजनीति को अपना लेते हैं, वही लंबे समय तक टिक पाते हैं। बाकी तो बस मीडिया की सुर्खियों में चमककर वक्त के साथ धुंधले हो जाते हैं।

कुछ अन्य वेब स्टोरीज

Story 1

टाइगर श्रॉफ पर हमले के खौफ के बीच जैकी और कृष्णा ने संभाला खुद को, सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखीं झलक

Story 1

छत्तीसगढ़ से जबलपुर तक 300 किमी का सफर: 40 हाथियों के झुंड ने बरगी में दी दस्तक, वन विभाग में हड़कंप

Story 1

बस में युवती के साथ छेड़छाड़: बहादुरी से रिकॉर्ड किया वीडियो, सोशल मीडिया पर मचा हड़कंप

Story 1

बीसीसीआई सेलेक्टर कैसे बनते हैं? जानिए चयन प्रक्रिया और योग्यता के कड़े नियम

Story 1

आंदोलन के चर्चित चेहरे: क्या भीड़ की ताकत वोट में बदल सकती है?

Story 1

कीवी सरजमीं पर हिटमैन की अग्निपरीक्षा: क्या रोहित शर्मा मिटा पाएंगे अपना पुराना दाग?

Story 1

मुंबई से अयोध्या जाना हुआ आसान: रेलवे चलाएगा 20 से ज्यादा स्पेशल ट्रेनें, चेक करें टाइम-टेबल

Story 1

पीएम मोदी की विदेश यात्राओं का ब्योरा सार्वजनिक नहीं होगा: दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Story 1

क्रीम रोल या वनस्पति वसा का धोखा? FSSAI का Zepto और Blinkit को कड़ा नोटिस

Story 1

लॉरेंस बिश्नोई को साहब कहने पर घिरी दिल्ली पुलिस, DCP अभिषेक धनिया के वायरल वीडियो पर मचा बवाल