प्रहार मूवी रिव्यू: क्या उज्ज्वल निकम की बायोपिक के तौर पर राजकुमार राव की फिल्म खरी उतर पाई?
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राजकुमार राव की बहुप्रतीक्षित फिल्म प्रहार आखिरकार सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। यह फिल्म देश को झकझोर देने वाले 26/11 मुंबई आतंकी हमलों और मशहूर वकील उज्ज्वल निकम के जीवन पर आधारित है। फिल्म में राजकुमार राव ने उज्ज्वल निकम की भूमिका निभाई है, जिन्होंने अजमल कसाब को फांसी की सजा दिलाने के लिए चार साल तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी थी।

एक गंभीर विषय, पर पटकथा में उलझी फिल्म प्रहार का विषय अत्यंत संवेदनशील और गंभीर है। फिल्म 26/11 के उन दुखद पलों को फिर से जीवंत करने और यह दिखाने की कोशिश करती है कि कैसे भारत ने तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों और कानूनी चुनौतियों के बावजूद कसाब को न्याय के कटघरे में खड़ा किया। हालांकि, दर्शकों की राय बंटी हुई है। अधिकांश दर्शकों का मानना है कि फिल्म का उद्देश्य नेक था, लेकिन निर्देशन और लेखन के स्तर पर यह काफी कमजोर साबित हुई है।

अभिनय और निर्देशन पर उठे सवाल फिल्म के निर्देशन पर सवाल उठाते हुए सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने लिखा है कि निर्देशक अविनाश अरुण महत्वपूर्ण कहानी को ढंग से पेश करने में विफल रहे हैं। राजकुमार राव के अभिनय पर भी मिश्रित प्रतिक्रिया मिली है। कुछ दर्शकों का मानना है कि कोर्टरूम दृश्यों में वे असहज दिखे और उनके लहजे (accent) में निरंतरता की कमी थी, जो एक बायोपिक के लिए जरूरी है। वहीं, वामिका गब्बी जैसे बेहतरीन कलाकार का उपयोग भी फिल्म में बहुत सीमित रहा।

लंबाई और रफ्तार बनी बाधा फिल्म की सबसे बड़ी कमी इसकी लंबाई और धीमी रफ्तार बताई जा रही है। दर्शकों का कहना है कि अगर फिल्म को 120 मिनट के भीतर कसावट के साथ पेश किया जाता, तो यह एक प्रभावशाली कोर्टरूम ड्रामा बन सकती थी। पटकथा का भटकना और अनावश्यक दृश्यों का समावेश फिल्म को भावनात्मक रूप से दर्शकों से जुड़ने में रोक देता है।

मिला-जुला रहा दर्शकों का एक्स रिएक्शन सोशल मीडिया पर प्रहार को लेकर प्रतिक्रियाएं मिली-जुली हैं। जहां कुछ लोग इसे एक फ्लॉप शो और निराशाजनक प्रयास बता रहे हैं, वहीं कुछ इसे एक ठीक-ठाक कोशिश मान रहे हैं। फिल्म के कोर्टरूम वाले कुछ दृश्य और दमदार भाषणों की सराहना जरूर हुई है, लेकिन कुल मिलाकर फिल्म उस गहराई को नहीं छू पाई, जिसकी इस विषय को जरूरत थी।

संक्षेप में कहें तो प्रहार एक महत्वपूर्ण कहानी को बयां करने का एक कच्चा प्रयास है, जो एक दमदार बायोपिक बनने के तमाम तत्वों के बावजूद दर्शकों के दिलो-दिमाग पर वैसी छाप नहीं छोड़ पाई, जिसकी उम्मीद की गई थी।

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