दुर्गा पूजा: जमींदारों के आंगन से यूनेस्को की वैश्विक सूची तक, कैसे कोलकाता बना दुनिया का सांस्कृतिक केंद्र?
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शारदीय नवरात्र की धूम के बीच आज पूरा पश्चिम बंगाल मां दुर्गा की भक्ति में सराबोर है। कोलकाता की सड़कों पर रोशनी, ढाक की गूंज और अनगिनत पंडालों का नजारा इस बात का गवाह है कि दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि कला, परंपरा और जन-भागीदारी का एक महाकुंभ है। आखिर कैसे यह उत्सव घरों से निकलकर पूरे शहर की धड़कन बन गया?

जमींदारों के आंगन से सार्वजनिक उत्सव तक

दुर्गा पूजा की जड़ें 16वीं-17वीं सदी में मिलती हैं। 1610 में कोलकाता के बरिशा में सबर्ण रॉय चौधरी परिवार द्वारा शुरू की गई पूजा जैसी कई परंपराएं पहले समृद्ध परिवारों के निजी आंगन या ठाकुर दालान तक सीमित थीं।

लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव आया। 18वीं सदी के अंत में हुगली के गुप्तिपाड़ा में बारोयारी (सार्वजनिक) पूजा की शुरुआत ने इसे आम लोगों से जोड़ दिया। कोलकाता में 1910 में भवानीपुर में हुई पहली सर्वजनिन पूजा ने इस उत्सव को घरों की दहलीज से बाहर निकालकर पूरे समुदाय का साझा त्योहार बना दिया। अब चंदा जुटाना और मिलकर पंडाल बनाना ही इस उत्सव की वास्तविक पहचान बन गई।

पंडाल: कला की अस्थायी दीर्घा

कोलकाता की दुर्गा पूजा को वैश्विक स्तर पर जो चीज अद्वितीय बनाती है, वह है पंडाल निर्माण की रचनात्मकता। हर साल बांस, कपड़े और मिट्टी से बने ये अस्थायी ढांचे किसी आधुनिक कला-दीर्घा से कम नहीं होते। मूर्तिकार, बढ़ई और चित्रकार महीनों पहले से जुट जाते हैं। कुम्हार टोली के कलाकार गंगा की मिट्टी से जो प्रतिमाएं गढ़ते हैं, वे पीढ़ियों से चले आ रहे हुनर का प्रमाण हैं। पंडाल महज पूजा स्थल नहीं होते, बल्कि वे सामाजिक विषयों और कल्पनाशीलता का जीवंत मंच बन जाते हैं।

यूनेस्को की वैश्विक मुहर

2021 में यूनेस्को ने दुर्गा पूजा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल कर इसे वैश्विक पहचान दी। यूनेस्को ने माना कि यह महज मूर्ति पूजा नहीं है, बल्कि यह एक जीवित परंपरा है। मूर्तियां बनाने का शिल्प, ढाक का संगीत, अनुष्ठान और सबसे बढ़कर, समुदाय की सामूहिक भागीदारी, इसे दुनिया के अन्य त्योहारों से अलग खड़ा करती है।

परंपरा और आधुनिकता का संगम

दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी ताकत इसका लचीलापन है। जहां एक ओर पारंपरिक रीति-रिवाज सदियों से अटूट हैं, वहीं दूसरी ओर हर साल पंडालों के जरिए पर्यावरण, सामाजिक मुद्दों और नए विचारों को भी स्थान दिया जाता है। यह उत्सव बंगाली संस्कृति, भाषा और कला का एक ऐसा ताना-बाना बुनता है, जो धार्मिक सीमाओं को पार कर हर उम्र और वर्ग के लोगों को एक साथ ले आता है।

कोलकाता दुर्गा पूजा का गढ़ इसलिए बना क्योंकि इसने परंपरा को कभी रुकने नहीं दिया, बल्कि उसे हर वर्ष नई कल्पनाओं के साथ जीवंत रखा। आज यह त्योहार सिर्फ बंगाल का नहीं, बल्कि मानवता के सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बन चुका है।

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