सूरत से पलायन: बंधुआ मजदूरी के खिलाफ मजदूरों का गांव चलो आंदोलन, खाली हो रहे कारखाने
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सूरत की चमक फीकी पड़ रही है दुनिया भर में डायमंड और टेक्सटाइल हब के रूप में मशहूर सूरत के कारखानों से अब मशीनों की गूंज कम होने लगी है। वर्षों तक शहर की इकॉनमी को अपनी मेहनत से सींचने वाले यूपी और बिहार के मजदूर अब अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर घर लौट रहे हैं। उन्होंने इसे गांव चलो आंदोलन का नाम दिया है।

शोषण की पराकाष्ठा: 30 दिन काम, कोई छुट्टी नहीं मजदूरों का आरोप है कि सूरत के फैक्ट्री मालिक उन्हें बंधुआ मजदूर की तरह व्यवहार कर रहे हैं। उनसे महीने के 30 दिन काम लिया जा रहा है और 12-12 घंटे की शिफ्ट का दबाव बनाया जा रहा है। विरोध करने या छुट्टी मांगने पर सैलरी काट ली जाती है और काम से निकाल दिया जाता है।

26 दिन ही काम करेंगे का संकल्प घर लौट रहे मजदूरों का कहना है कि वे अब अपनी शर्तों पर काम करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे महीने में सिर्फ 26 दिन ही काम करने के पक्ष में हैं। मालिकों के दबाव के आगे झुकने के बजाय, हजारों मजदूरों ने इस्तीफा देकर अपने गृह राज्यों की राह पकड़ ली है। उनका कहना है कि वे तभी लौटेंगे जब उन्हें सम्मानजनक काम मिलेगा।

रेलवे स्टेशनों पर भारी भीड़ दीपावली और छठ से पहले शुरू हुए इस पलायन की वजह से सूरत के रेलवे स्टेशन खचाखच भर गए हैं। बिहार और यूपी जाने वाली ट्रेनों में तिल रखने की जगह नहीं है। अचानक नौकरी छूटने से कई मजदूर हताश और निराश हैं, लेकिन वे वापस लौटने के बजाय अपने गांव को ही बेहतर विकल्प मान रहे हैं।

लेबर यूनियन ने दी चेतावनी मजदूरों के इस अभियान को अब लेबर यूनियन का भी समर्थन मिल गया है। यूनियन प्रतिनिधि अजय डी. दुबे का कहना है कि सूरत की एम्ब्रॉयडरी और टेक्सटाइल इंडस्ट्री की रीढ़ ये मजदूर ही हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि फैक्ट्री मालिकों ने शोषण बंद नहीं किया, तो सूरत की पूरी इंडस्ट्री पर ताले लटकने की नौबत आ जाएगी। फिलहाल, यूनियन स्टेशनों पर लौट रहे मजदूरों को हर संभव मदद मुहैया करा रही है।

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