इमरजेंसी का वह खौफनाक दौर: जब इंदिरा के खिलाफ बोलने भर से हो जाती थी उम्रकैद
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बीजेपी सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने देश में लगे 1975 के आपातकाल (इमरजेंसी) की याद ताजा करते हुए आज के माहौल पर तल्ख टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी को पता ही नहीं है कि इमरजेंसी क्या थी। उस दौर में अगर कोई सार्वजनिक स्थल पर इंदिरा गांधी की सरकार को हटाने की बात भी कह देता था, तो उसे तुरंत जेल में डाल दिया जाता था और सुनवाई का कोई रास्ता भी नहीं बचता था।

अभिव्यक्ति की आजादी पर सवाल

सुधांशु त्रिवेदी ने मौजूदा दौर से तुलना करते हुए कहा कि आज लोग प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ निराधार और अनर्गल बातें करते हैं, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। उन्होंने उन लोगों पर निशाना साधा जो आज मानवाधिकार का हवाला देते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इमरजेंसी के दौरान मानवाधिकार पूरी तरह सस्पेंड कर दिए गए थे।

क्या था खौफनाक DIR कानून?

सुधांशु त्रिवेदी ने डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स (DIR) का जिक्र किया। 1971 के इस कानून के तहत सरकार को असीमित शक्तियां दी गई थीं। इसका मकसद देश की सुरक्षा के नाम पर विरोध को कुचलना था। इसके अंतर्गत सरकार किसी भी सभा, जुलूस और प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा सकती थी। बिना किसी ठोस कारण के भी सरकार को विरोधी गतिविधियों के नाम पर लोगों को जेल भेजने का पूरा अधिकार था।

मीसा (MISA): बिना मुकदमे के जेल

इमरजेंसी में विपक्ष को ठिकाने लगाने के लिए मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (MISA) का जमकर दुरुपयोग हुआ। 1971 के इस कानून के तहत सरकार किसी भी व्यक्ति को संभावित खतरे के आधार पर बिना मुकदमा चलाए डिटेंशन में रख सकती थी। इसमें अदालत जाने का हक तक छीन लिया गया था और सरकार को किसी की भी गिरफ्तारी और संपत्ति जब्त करने की खुली छूट थी।

जब अदालतें भी हो गई थीं लाचार

इमरजेंसी के दौरान नागरिकों की स्थिति का अंदाजा एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला केस से लगाया जा सकता है। 1976 के इस चर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत से फैसला दिया था कि राष्ट्रपति का आदेश प्रभावी रहने तक गिरफ्तार व्यक्ति कानून से संरक्षण नहीं मांग सकता।

सुधांशु त्रिवेदी ने उस दौर का जिक्र किया जब कोर्ट में बहस के दौरान यह सवाल उठा था कि अगर पुलिस किसी को गोली मार दे, तो क्या परिवार न्याय नहीं मांग सकता? तब तत्कालीन सरकार के वकील ने तर्क दिया था कि इमरजेंसी में नागरिकों को जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार भी कानूनी रूप से प्रभावी नहीं है। यह घटना आज भी भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का सबसे काला अध्याय मानी जाती है।

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