भारत ने UN को दो टूक जवाब: दिल्ली प्रदर्शन हमारा आंतरिक मामला, दखल बर्दाश्त नहीं
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नई दिल्ली: दिल्ली में हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों और इस दौरान हुई गिरफ्तारियों को लेकर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) द्वारा जताई गई चिंता पर भारत ने कड़ा रुख अपनाया है। विदेश मंत्रालय ने इसे देश के आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप करार दिया है।

भारत का कड़ा रुख: यह हमारा अंदरूनी मामला है विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणी को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत के संविधान के तहत शांतिपूर्ण सभा का अधिकार सुरक्षित है, लेकिन साथ ही सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है। भारत ने इस बात पर जोर दिया कि बाहरी संस्थाओं द्वारा इस तरह की टिप्पणियां करना पूरी तरह अनुचित है।

संविधान और लोकतंत्र का हवाला जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन ने एक कड़ा बयान जारी कर अपनी स्थिति स्पष्ट की। मिशन ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहाँ स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया और मजबूत संवैधानिक संस्थाएं नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम हैं। भारत ने कहा कि लोकतंत्र में सार्वजनिक व्यवस्था के लिए कानून के दायरे में रहकर कुछ प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, और नागरिक अपनी शिकायतों के लिए न्यायालय जाने के लिए स्वतंत्र हैं।

UN ने क्या जताई थी चिंता? संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने दिल्ली में प्रदर्शनकारियों, पत्रकारों, वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की हिरासत को लेकर चिंता जाहिर की थी। UN ने भारतीय अधिकारियों से अपील की थी कि वे शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का सम्मान करें और प्रदर्शनकारियों से निपटने में संयम बरतें। साथ ही, उन्होंने मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए लोगों को रिहा करने की भी मांग की थी।

भारत का पलटवार: UN का रुख पक्षपाती भारत ने OHCHR की निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र का यह कार्यालय चयनात्मक दृष्टिकोण अपनाता है। भारत ने तंज कसते हुए कहा कि जिस तरह से UN दिल्ली की घटनाओं पर मुखर हुआ है, उसे अपने पड़ोसी देशों या दुनिया के अन्य हिस्सों में होने वाले हिंसक विरोध प्रदर्शनों और उन पर होने वाली कार्रवाई पर भी समान निष्पक्षता दिखानी चाहिए।

निष्कर्ष यह विवाद एक बार फिर मानवाधिकारों के संरक्षण और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर छिड़ी बहस को दर्शाता है। भारत ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वह अपने लोकतांत्रिक ढांचे और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े निर्णयों में किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेगा।

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