अमेरिकी वीजा नियमों में बड़ा बदलाव: माइक्रोसॉफ्ट, इंफोसिस और टीसीएस समेत 7 बड़ी कंपनियों पर सख्त कार्रवाई
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अमेरिकी प्रशासन ने विदेशी कर्मचारियों और वीजा नियमों को लेकर एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने माइक्रोसॉफ्ट, एडोब और भारतीय आईटी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों—इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), विप्रो, एचसीएल, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम (PERM) से निलंबित कर दिया है।

क्या है PERM और क्यों हुई कार्रवाई? PERM अमेरिका में रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड हासिल करने की प्रक्रिया का पहला और सबसे अहम चरण है। इसके जरिए नियोक्ताओं को यह साबित करना होता है कि उस विशिष्ट पद के लिए अमेरिका में कोई योग्य कर्मचारी उपलब्ध नहीं है। अमेरिकी अधिकारियों का आरोप है कि ये कंपनियां वीजा कार्यक्रमों का दुरुपयोग कर रही हैं और इसकी आड़ में अमेरिकी नागरिकों की नौकरियों को प्रभावित किया जा रहा है।

जेडी वेंस की दो टूक: अमेरिकी कर्मचारियों को दें प्राथमिकता अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट के निलंबन की पुष्टि करते हुए स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा, हम चाहते हैं कि कंपनियां अमेरिका में निवेश करें और बढ़ें, लेकिन उन्हें अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी पर रखना होगा। वेंस ने जोर देकर कहा कि कंपनियां विदेशी कर्मचारियों के लिए अमेरिकी लोगों की बलि नहीं दे सकतीं। जांच पूरी होने तक माइक्रोसॉफ्ट अब अपने H-1B कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया शुरू नहीं कर पाएगा।

H-1B वीजाधारकों पर सीधा प्रभाव यह कार्रवाई सीधे तौर पर H-1B वीजा को रद्द नहीं करती है, लेकिन उन लाखों विदेशी पेशेवरों के लिए एक बड़ा झटका है जो अमेरिका में स्थायी निवासी (Permanent Resident) बनने की राह देख रहे थे। PERM प्रक्रिया रुकने का मतलब है कि इन कंपनियों में कार्यरत विदेशी कर्मचारियों के ग्रीन कार्ड आवेदन अधर में लटक गए हैं।

भारतीय आईटी सेक्टर पर संकट के बादल अमेरिका में भारतीय आईटी कंपनियों की भारी मौजूदगी है। PERM निलंबन से इन कंपनियों के जरिए ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे हजारों भारतीय आईटी पेशेवरों का भविष्य अनिश्चित हो गया है। प्रशासन की यह सख्ती कंपनियों को अपनी भर्ती नीतियों में बदलाव करने पर मजबूर कर सकती है।

यूनिवर्सिटी भी दायरे में प्रशासन की नजर सिर्फ कंपनियों पर ही नहीं, बल्कि नामी विश्वविद्यालयों पर भी है। हार्वर्ड, येल और स्टैनफोर्ड जैसे संस्थानों के खिलाफ जांच शुरू की गई है। अधिकारियों को शक है कि इन विश्वविद्यालयों के कुछ कार्यक्रमों का इस्तेमाल अमेरिकी श्रम बाजार में वेतन और रोजगार को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है। अमेरिकी श्रम विभाग फिलहाल इस मामले में समन जारी कर जांच को आगे बढ़ा रहा है।

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