हिमालयन टॉयलेट्स में छिपते थे बम और पत्नी बनकर भगत सिंह को बचाया: ऐसी थी दुर्गा भाभी की जांबाजी
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आजादी की लड़ाई में कई ऐसे नाम हैं जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर इतिहास की दिशा बदल दी। इन्हीं गौरवशाली नामों में से एक हैं दुर्गावती देवी, जिन्हें पूरा देश दुर्गा भाभी के नाम से जानता है। आज उनकी जयंती पर हम उस मर्दानी को याद कर रहे हैं, जिसके साहस से ब्रिटिश हुकूमत भी कांपती थी।

सांडर्स हत्याकांड के बाद रची गई मास्टर प्लान 1928 में ब्रिटिश अफसर जॉन पी. सांडर्स की हत्या के बाद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु अंग्रेजी पुलिस की मोस्ट वांटेड लिस्ट में थे। लाहौर से उन्हें सुरक्षित निकालने की जिम्मेदारी दुर्गा भाभी ने उठाई। भगत सिंह ने अपनी पहचान छिपाने के लिए दाढ़ी कटवा ली थी। उनका बदला हुआ हुलिया ऐसा था कि खुद दुर्गा भाभी उन्हें पहली बार में पहचान नहीं पाईं। सुखदेव ने तब कहा था, अगर आप इन्हें नहीं पहचान पाईं, तो पुलिस क्या खाक पहचानेगी।

ट्रेन का सफर और चतुराई 19 दिसंबर 1928 को दुर्गा भाभी ने भगत सिंह को अपना पति और शचींद्र (उनके बेटे) को गोद में लिया, जबकि राजगुरु उनके नौकर बन गए। अंग्रेजी पुलिस से बचने के लिए उन्होंने सीधे कलकत्ता की ट्रेन न लेकर पहले कानपुर का टिकट लिया, फिर लखनऊ से कलकत्ता की यात्रा की। इस तरह वे सीआईडी की नजरों से बचते हुए सुरक्षित निकल गए।

हिमालयन टॉयलेट्स में बम फैक्ट्री क्या आप जानते हैं कि क्रांतिकारियों के लिए बम कहां बनते थे? दिल्ली के कुतुब रोड पर हिमालयन टॉयलेट्स नाम की एक फैक्ट्री थी। ऊपर से देखने में यह टॉयलेट सीट बनाने वाली कंपनी लगती थी, लेकिन अंदर दुर्गा भाभी और उनके पति भगवती चरण वोहरा की देखरेख में खतरनाक विस्फोटक तैयार किए जाते थे।

गवर्नर पर हमला और गिरफ्तारी दुर्गा भाभी केवल मदद ही नहीं करती थीं, वे सीधा मोर्चा लेने में विश्वास रखती थीं। 9 अक्टूबर 1930 को उन्होंने पंजाब के पूर्व गवर्नर लॉर्ड हैली पर जानलेवा हमला किया। हालांकि गवर्नर बाल-बाल बच गए, लेकिन इस घटना ने ब्रिटिश शासन की नींद उड़ा दी। इसी के बाद उनकी गिरफ्तारी हुई और उन्हें तीन साल की जेल काटनी पड़ी।

गुमनामी में बीता जीवन 1930 में जब उनके पति भगवती चरण वोहरा की रावी नदी के तट पर बम परीक्षण के दौरान मृत्यु हुई, तो दुर्गा भाभी पूरी तरह टूट चुकी थीं, लेकिन उनका हौसला अटूट रहा। आजादी के बाद उन्होंने लखनऊ में बच्चों के लिए मांटेसरी स्कूल खोला और अपना आखिरी जीवन गाजियाबाद में बेहद सादगी और गुमनामी के बीच बिताया। 14 अक्टूबर 1999 को 92 वर्ष की आयु में इस वीरांगना ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

दुर्गा भाभी का जीवन त्याग, साहस और अदम्य राष्ट्रभक्ति की मिसाल है। उनके बिना भारत के क्रांतिकारी इतिहास का एक बड़ा हिस्सा अधूरा रहता।

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