गांधी जयंती विशेष: जब बापू ने बलौदाबाजार में तोड़ी छुआछूत की दीवारें, दलितों के साथ मंदिर में किया प्रवेश
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स्वतंत्रता संग्राम के पन्नों में बलौदाबाजार का एक गौरवशाली इतिहास दर्ज है। आज से करीब 93 साल पहले, 26 नवंबर 1933 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस धरती पर कदम रखा था। यह यात्रा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का एक बड़ा अध्याय बनी।

मंदिर में दलितों संग प्रवेश: सामाजिक समरसता की मिसाल

गांधीजी अपने देशव्यापी दौरे के जरिए छुआछूत जैसी कुरीतियों के खिलाफ जन-जागरण कर रहे थे। रायपुर से होते हुए बलौदाबाजार पहुंचने पर उन्होंने पुरानी बस्ती स्थित मावली मंदिर और जगन्नाथ (गोपाल) मंदिर का दौरा किया।

तत्कालीन कठोर जातिगत बंदिशों को चुनौती देते हुए गांधीजी ने दलित समुदाय के लोगों को अपने साथ लेकर मंदिर में प्रवेश किया। इस साहसपूर्ण कदम ने समाज में समानता और एकता का एक ऐसा संदेश दिया, जिसने लोगों की सोच को झकझोर कर रख दिया।

दलित के हाथ से पानी पीकर दिया कड़ा संदेश

गांधीजी के दौरे का एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम पुरानी कृषि उपज मंडी परिसर में हुआ। वहां एक सभा के दौरान, गांधीजी ने एक दलित व्यक्ति से कुएं से पानी निकलवाया और उसी के हाथों से जल ग्रहण किया।

उस दौर में यह कार्य किसी बड़े धमाके से कम नहीं था। स्थानीय लोगों के अनुसार, गांधीजी के इस कदम ने छुआछूत की बेड़ियों को कमजोर किया, जिससे भविष्य में शहर के सभी मंदिरों के दरवाजे हर वर्ग के लिए खुलने का रास्ता आसान हुआ।

स्वतंत्रता सेनानियों का मिला साथ

इस ऐतिहासिक यात्रा के दौरान क्षेत्र के कई दिग्गज स्वतंत्रता सेनानियों ने गांधीजी का मार्गदर्शन किया। इनमें रघुनाथ प्रसाद केसरवानी, मनोहर दास वैष्णव, पंडित लक्ष्मी प्रसाद तिवारी और रामकुमार पांडेय जैसे प्रमुख नाम शामिल थे। इन लोगों ने गांधीजी के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई।

बापू की विरासत आज भी जीवंत

गांधीजी का मानना था कि आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजों से मुक्ति नहीं, बल्कि समाज के भीतर पसरी छुआछूत और भेदभाव से मुक्ति भी है। बलौदाबाजार में उनके द्वारा बोया गया समरसता का बीज आज भी सामाजिक भाईचारे के रूप में जीवित है।

गांधी जयंती के उपलक्ष्य में बापू की यह यात्रा याद दिलाती है कि समानता और सद्भाव ही किसी भी राष्ट्र की असली नींव होते हैं। उनके विचार आज भी समाज को एक नई दिशा देने में सक्षम हैं।

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