अखबार में लिपटी मिठाई से एशियन गेम्स के गोल्ड तक: लवलीना बोरगोहेन की संघर्ष भरी कहानी
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जन्मदिन पर देश को अनमोल तोहफा एशियन गेम्स में भारत का परचम लहराते हुए लवलीना बोरगोहेन ने महिलाओं के 75 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में चीन की जियी बाओ को धूल चटा दी। अपने जन्मदिन के दिन गोल्ड मेडल जीतकर लवलीना ने देश को जीत का शानदार तोहफा दिया है। यह एशियन गेम्स में भारत का 12वां स्वर्ण पदक है।

पिछली बार की कसर हुई पूरी टोक्यो ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीत चुकीं लवलीना के लिए यह जीत बेहद खास है। पिछले एशियन गेम्स में उन्हें फाइनल मुकाबले में हार का सामना करना पड़ा था और सिल्वर मेडल से संतोष करना पड़ा था। इस बार उन्होंने सेमीफाइनल में वर्ल्ड चैंपियन नतालिया बोगदानोवा को हराकर अपने इरादे साफ कर दिए थे और फाइनल में कोई चूक नहीं की।

1300 रुपये की कमाई और तंगहाली भरा बचपन असम के गोलाघाट जिले के एक छोटे से गांव बारामुखिया में जन्मीं लवलीना तीन बहनों में सबसे छोटी हैं। उनके पिता टिकेन बोरगोहेन एक छोटे व्यापारी थे, जिनकी मासिक आय मात्र 1300 रुपये थी। इतने कम पैसों में बड़े परिवार का पेट पालना बेहद चुनौतीपूर्ण था। मुफलिसी के बीच लवलीना का बचपन संघर्षों से भरा रहा।

एक पुराने अखबार ने बदल दी तकदीर शुरुआत में लवलीना और उनकी बहनें म्यूथाई मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग लेती थीं। एक दिन उनके पिता घर मिठाई लाए। मिठाई जिस पुराने अखबार में लिपटी थी, उसमें महान बॉक्सर मोहम्मद अली के बारे में एक लेख छपा था। उस लेख को पढ़कर लवलीना के भीतर बॉक्सर बनने की ऐसी आग जगी कि उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

कोच की नजर और सफलता का सफर अपनी बहनों के विपरीत लवलीना ने बॉक्सिंग का रास्ता चुना। साल 2013 में जब वह 16 साल की थीं, तो स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के कैंप में कोच पदुम बोरो की नजर उन पर पड़ी। यह उनके करियर का टर्निंग पॉइंट बना। इसके बाद संध्या गुरुंग के मार्गदर्शन में उन्होंने अपनी तकनीक को निखारा।

पुलिस अफसर और प्रेरणा का प्रतीक खेल में लगातार शानदार प्रदर्शन के दम पर लवलीना ने न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई, बल्कि अपनी मेहनत से समाज में ऊंचा मुकाम भी हासिल किया। टोक्यो ओलंपिक 2020 में ब्रॉन्ज मेडल जीतने के बाद असम सरकार ने उन्हें डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (DSP) के पद पर नियुक्त किया। आज लवलीना न केवल असम की बल्कि पूरे भारत की शान बन चुकी हैं।

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