राजस्थान कांग्रेस में अंदरूनी जंग : निकाय चुनाव की हार के बाद डोटासरा के इस्तीफे की मांग
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राजस्थान में हालिया शहरी निकाय चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए न केवल राजनीतिक झटका साबित हुए, बल्कि पार्टी के भीतर दबी हुई कलह को भी सतह पर ले आए हैं। पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा पर सीधा हमला बोला है।

टिकट बंटवारे पर भड़के विश्वेंद्र सिंह विश्वेंद्र सिंह ने हार का ठीकरा टिकट बंटवारे पर फोड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भरतपुर और डीग में पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर अपने चहेतों को टिकट बांटे गए। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि जब मजबूत गढ़ में पार्टी ऐसी स्थिति में पहुंच जाए, तो प्रदेश नेतृत्व की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने डोटासरा से इस्तीफे की मांग की है।

भर्ती परीक्षाओं के पुराने जख्म फिर हरे विवाद केवल चुनावी हार तक सीमित नहीं है। विश्वेंद्र सिंह ने डोटासरा के खिलाफ 2016 और 2018 की RAS भर्तियों का मुद्दा फिर उठाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि डोटासरा के परिवार के सदस्यों को इंटरव्यू में असामान्य रूप से 80-80 अंक दिए गए।

साथ ही, उन्होंने डोटासरा के शिक्षा मंत्री रहने के दौरान REET परीक्षा में हुई धांधली के आरोपों की भी उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से इन मामलों में निष्पक्ष जांच की अपील की है।

डोटासरा का बचाव: इसे बीजेपी की टूलकिट बताया आरोपों के घेरे में आए गोविंद सिंह डोटासरा ने पार्टी के भीतर किसी भी मतभेद से इनकार किया है। उन्होंने पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी पूरी तरह एकजुट है। उन्होंने विश्वेंद्र सिंह के दावों को बीजेपी की टूलकिट का हिस्सा करार दिया और कहा कि विपक्ष गलत जानकारी फैलाकर भ्रम पैदा करना चाहता है।

भरतपुर का गणित और सियासी समीकरण भरतपुर नगर निगम के नतीजों ने पार्टी की चिंता बढ़ा दी है। यहां कुल 65 सीटों में से निर्दलीय 36, बीजेपी 20 और कांग्रेस महज 7 सीटें ही जीत पाई। बहुमत के लिए 33 सीटों की जरूरत थी, लेकिन कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा।

गहलोत कैंप की सक्रियता? विश्वेंद्र सिंह को पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का करीबी माना जाता है। डोटासरा और गहलोत के बीच पहले से ही राजनीतिक खींचतान की खबरें चर्चा में रही हैं। ऐसे में विश्वेंद्र सिंह का यह रुख कांग्रेस की आंतरिक राजनीति में किसी बड़े बदलाव या गुटबाजी के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

अब सबकी निगाहें आलाकमान पर हैं कि क्या इस बगावती स्वर पर कोई कार्रवाई होती है या पार्टी इसे सामान्य संगठनात्मक असंतोष मानकर नजरअंदाज कर देगी।

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