होर्मुज जलडमरूमध्य का बदलता खेल: भारतीय रिफाइनरियों ने क्यों खुद संभाली तेल की कमान?
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भारत की सरकारी और निजी तेल रिफाइनरियों ने अपनी कच्चे तेल की खरीद रणनीति में आमूलचूल परिवर्तन किया है। अब कंपनियां विदेशी ट्रेडर्स पर निर्भर रहने के बजाय खुद टैंकर किराए पर लेकर तेल मंगा रही हैं।

जोखिम कम करने की कवायद मार्च के बाद से होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण भारतीय कंपनियां अपने जहाज भेजने से बच रही थीं। सारा जोखिम विदेशी सप्लायरों पर छोड़ने के कारण भारत को भारी प्रीमियम और अतिरिक्त लागत चुकानी पड़ रही थी। अब कंपनियों ने सीधे फ्री-ऑन-बोर्ड (FOB) आधार पर सौदे करना शुरू कर दिया है।

FOB सौदों से लागत पर नियंत्रण इंडियन ऑयल, रिलायंस इंडस्ट्रीज, भारत पेट्रोलियम और HPCL-मित्तल एनर्जी जैसी कंपनियों ने इराकी कच्चे तेल के लिए FOB शर्तें अपनाई हैं। इसके तहत कार्गो को सुरक्षित मंजिल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी खुद खरीदार की होती है। इससे कंपनियों को अपनी परिवहन लागत पर बेहतर नियंत्रण मिल रहा है।

नाविकों के नियमों में ढील और भारी डिस्काउंट इस बदलाव के पीछे दो बड़े कारण हैं। पहला, डायरेक्टरेट जनरल ऑफ़ शिपिंग ने भारतीय क्रू वाले जहाजों के लिए इस रूट पर जाने की इजाजत दे दी है। दूसरा, इराक की सरकारी कंपनी SOMO द्वारा अक्टूबर के अनुबंधों पर 37 डॉलर प्रति बैरल तक की भारी छूट दी जा रही है।

सितंबर में बढ़ा आयात तनाव के बावजूद सितंबर में होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते भारत का कच्चा तेल आयात बढ़कर 1.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन के स्तर पर पहुंच गया है। फरवरी के बाद से यह सबसे ऊंचा आंकड़ा है।

विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम न केवल भारत की सप्लाई चेन को सुरक्षित करेगा, बल्कि वैश्विक बाजार में सस्ते तेल की प्राप्ति को भी आसान बनाएगा। अमेरिका के बढ़ते दबाव के बीच, भारत अब रूसी तेल के साथ-साथ मध्य-पूर्व के विकल्पों को और अधिक मजबूती से इस्तेमाल कर रहा है।

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