दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा पर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का कड़ा रुख: लड़कियों को नहीं, अब लड़कों को सिखाने का वक्त
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दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा को लेकर एक बड़ा और तीखा सवाल उठाया है। उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि समाज में सुरक्षा का पूरा बोझ लड़कियों के कंधों पर डालना गलत है और अब वक्त आ गया है कि लड़कों की परवरिश और उनके व्यवहार पर गंभीर चर्चा की जाए।

लड़कियों पर पाबंदियां क्यों? मुख्यमंत्री ने सवाल किया कि समाज में हमेशा लड़कियों को ही डूज एंड डोंट्स (क्या करें, क्या न करें) की लिस्ट क्यों थमाई जाती है? उन्होंने कहा, लड़कियों को अक्सर सिखाया जाता है कि क्या पहनना है, कहां जाना है और कैसे रहना है। लेकिन यह सवाल कोई नहीं पूछता कि लड़कों को क्या सिखाया जा रहा है? उन्होंने जोर देकर कहा कि आधी आबादी की सुरक्षा केवल लड़कियों के सावधानी बरतने से सुनिश्चित नहीं हो सकती।

ना का मतलब ना होता है रेखा गुप्ता ने स्पष्ट किया कि सहमति (Consent) का सम्मान करना हर पुरुष की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा, No का मतलब No होता है और इस पर कोई समझौता नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री ने भरोसा दिलाते हुए कहा कि एक महिला, मां और मुख्यमंत्री के तौर पर वे दिल्ली की हर बेटी के साथ खड़ी हैं। उनकी हर साहसी आवाज़ में सरकार का पूरा समर्थन है।

पीएम मोदी के विजन को आगे बढ़ाया मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 के लाल किले वाले उस भाषण का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने परिवारों से पूछा था कि देर से घर आने पर केवल बेटियों से ही सवाल क्यों किए जाते हैं? रेखा गुप्ता ने इसी सोच को दोहराते हुए कहा कि जिस तरह बेटी को सुरक्षा के नियम सिखाए जाते हैं, उसी गंभीरता से बेटों को भी उनके व्यवहार और जिम्मेदारी के प्रति शिक्षित किया जाना चाहिए।

परवरिश और समाज की साझा जिम्मेदारी सीएम ने साफ किया कि सुरक्षा केवल पुलिस या कानून का विषय नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें हमारे घरों और परवरिश में हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों को शुरुआत से ही यह सिखाना जरूरी है कि किसी की इच्छा, सीमा और ना का सम्मान कैसे करना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दिल्ली में किसी भी कीमत पर गलत हरकत करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।

सुरक्षा के लिए सरकार की नई पहल दिल्ली में महिलाओं के प्रति बढ़ती चिंताओं के बीच, सरकार ने हाल ही में DURGA योजना को मंजूरी दी है। इसके तहत महिलाओं और ट्रांसजेंडर लोगों के लिए 1,300 इलेक्ट्रिक ऑटो चलाए जाएंगे। इसका उद्देश्य न केवल महिलाओं को रोजगार देना है, बल्कि उन्हें सुरक्षित और सुलभ परिवहन सुविधा भी मुहैया कराना है।

निष्कर्ष: सोच बदलने की जरूरत रेखा गुप्ता का संदेश सीधा और स्पष्ट है—सुरक्षा के नाम पर लड़कियों की आजादी सीमित करना समाधान नहीं है। असली समाधान उस माहौल को बदलने में है, जहाँ लड़कों को महिलाओं के सम्मान की शिक्षा दी जाए और उल्लंघन करने पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए। अब समय आ गया है कि समाज लड़कियों को टोकने के बजाय लड़कों के व्यवहार पर नजर रखे।

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