IAS की कुर्सी छोड़ राजनीति में उतरीं दिव्या मित्तल, क्या नौकरशाह से जननेता का सफर होगा आसान?
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उत्तर प्रदेश की चर्चित पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देने के बाद अब राजनीति के मैदान में उतरने का औपचारिक ऐलान कर दिया है। 13 साल की सेवा के बाद अगस्त में इस्तीफा देने वाली दिव्या ने स्पष्ट किया है कि वे किसी दल में शामिल होने के बजाय आम लोगों के साथ मिलकर एक नया मंच तैयार करेंगी।

राजभर का तंज: IAS बनना आसान, विधायक बनना नहीं

दिव्या मित्तल के इस फैसले पर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष और मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। राजभर ने कहा, आईएएस बनना आसान है, लेकिन चुनाव लड़ना और विधायक बनना बिल्कुल आसान नहीं है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि दिव्या मित्तल के पास खूब पैसा होगा, इसलिए वे चुनाव लड़ने की सोच रही हैं, लेकिन जनता का प्रतिनिधि बनना एक अलग चुनौती है।

सरकारी फाइलों की बंदिशों से बाहर की राजनीति

दिव्या मित्तल का कहना है कि उनका राजनीति में आने का निर्णय अचानक नहीं है। प्रशासनिक सेवा के दौरान उन्होंने देखा कि नियम और संसाधन होने के बावजूद काम जमीन पर नहीं उतरते। उन्होंने लहुरियादह की पहाड़ी के एक स्कूल का उदाहरण देते हुए कहा कि स्वीकृत होने के बावजूद स्कूल न बनना केवल संवेदनशीलता की कमी को दर्शाता है। वे उन लोगों की आवाज बनना चाहती हैं जिनकी सुनवाई सरकारी दफ्तरों में नहीं होती।

जमीन, रोजगार और AI: दिव्या का विजन

पूर्व आईएएस ने अपनी राजनीति का एजेंडा भी साफ कर दिया है। उनके मुख्य मुद्दों में सड़क, पुल, भ्रष्टाचार से मुक्ति, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य जैसे विषय शामिल हैं। इसके अलावा, उन्होंने एआई (AI) के दौर में रोजगार के बदलते स्वरूप पर भी चिंता जताई है। दिव्या का तर्क है कि वे केवल राजनीति का चेहरा नहीं बदलना चाहतीं, बल्कि राजनीति की कार्यप्रणाली में न्याय और दूरदर्शिता लाना चाहती हैं।

ऊपर कौन है? सिस्टम से आर-पार का इरादा

दिव्या ने अपने प्रशासनिक अनुभव से जुड़े एक भूमि पट्टे के मामले का जिक्र किया, जहां ऊपर से रोक की बात सामने आई थी। उन्होंने सवाल उठाया कि संविधान में जनता सर्वोपरि है, तो फिर यह ऊपर कौन है? वे चाहती हैं कि जनता को उनका हक मिले, न कि उसे किसी कृपा की तरह देखा जाए।

एक नई शुरुआत की चुनौती

लंदन में जेपी मॉर्गन जैसे संस्थानों में काम करने के बाद सिविल सेवा में आईं दिव्या का सफर हमेशा से चर्चाओं में रहा है। मिर्जापुर से लेकर देवरिया तक जिलाधिकारी के तौर पर अपनी पहचान बनाने के बाद अब उनके सामने एक स्वतंत्र राजनीतिक मंच खड़ा करने की बड़ी चुनौती है। एक तरफ दिव्या इरादे की राजनीति की बात कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ अनुभवी राजनेताओं के तंज बता रहे हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनके लिए राह आसान नहीं होगी।

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