CEC को देशद्रोही कहे जाने पर IRS अधिकारी निशा उरांव का पलटवार, कहा- लोकतंत्र की कड़वी दवा है SIR
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देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर मचा सियासी घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को देशद्रोही कहे जाने के बाद अब सत्ता के गलियारों से तीखी प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं।

निशा उरांव का कड़ा संदेश झारखंड में पदस्थ वरिष्ठ IRS अधिकारी निशा उरांव ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर अपनी नाराजगी जताई है। उन्होंने चुनाव आयोग के संवैधानिक दायरे पर सवाल उठाने और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए देशद्रोही जैसे शब्दों के इस्तेमाल को गलत ठहराया है।

इतिहास के पन्नों से दिया जवाब निशा उरांव ने वर्ष 1990 से 2009 के बीच चुनाव आयोग में हुए आंतरिक विवादों का उल्लेख किया। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे टी.एन. शेषन ने तीन सदस्यीय आयोग के गठन का विरोध किया था और कैसे 2009 में तत्कालीन CEC एन. गोपालस्वामी ने नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की थी। उरांव का कहना है कि तब भी मतभेद थे, लेकिन किसी ने संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को देशद्रोही नहीं कहा।

बीमार लोकतंत्र की कड़वी दवा SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन) के मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए उन्होंने इसे बीमार लोकतंत्र के लिए कड़वी लेकिन जरूरी दवा करार दिया है। उन्होंने कहा कि दवा के कुछ दुष्प्रभाव हो सकते हैं, लेकिन वे लोकतंत्र को नष्ट नहीं करते।

सुप्रीम कोर्ट का समर्थन IRS अधिकारी ने अपने तर्कों के समर्थन में सर्वोच्च न्यायालय का हवाला दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि माननीय न्यायालय ने SIR को सुरक्षित माना है और इसे अनुच्छेद 324 के तहत संवैधानिक दायित्वों का हिस्सा बताया है। उनके अनुसार, शीर्ष अदालत की मुहर के बाद इस प्रक्रिया पर सवाल उठाना अनुचित है।

राजनीतिक विमर्श पर सवाल निशा उरांव के इस बयान ने प्रशासनिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है। एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा चुनाव आयोग के बचाव में उतरना यह दर्शाता है कि संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को लेकर नौकरशाही और राजनीतिक खेमों के बीच मतभेद गहरे होते जा रहे हैं। विपक्षी दलों की ओर से हालांकि अभी तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

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