क्या ₹1 लाख के नीचे लुढ़क जाएगा सोने का भाव? जानिए क्यों फीकी पड़ रही चमक
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भारतीय सर्राफा बाजार में सोने की कीमतों में अचानक आई तेज गिरावट ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। पिछले कुछ दिनों में सोना ₹1.48 लाख से ₹1.52 लाख प्रति 10 ग्राम के दायरे से नीचे खिसकते हुए MCX पर ₹1.47 लाख के करीब आ गया है। सोमवार को एक ही दिन में ₹4,000 की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। अब बाजार में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सोना फिर से ₹1 लाख के स्तर तक गिर सकता है?

अमेरिका की सख्त नीति का दबाव

सोने के दाम घटने की पहली मुख्य वजह अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति है। 10-वर्षीय अमेरिकी बॉन्ड यील्ड उछलकर 5.2% के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो बिना ब्याज देने वाली संपत्ति (जैसे सोना) की मांग कम हो जाती है। इसके अलावा, डॉलर की मजबूती ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने की कीमतों पर भारी दबाव बनाया है।

क्रूड ऑयल और भू-राजनीतिक तनाव

आमतौर पर महंगाई बढ़ने पर गोल्ड की मांग बढ़ती है, लेकिन वर्तमान हालात अलग हैं। हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) में चल रहे तनाव के कारण क्रूड ऑयल के दाम $110 प्रति बैरल के पास पहुंच गए हैं। तेल की बढ़ती कीमतों ने सोने और कच्चे तेल के बीच के सामान्य जुड़ाव (कोरिलेशन) को बिगाड़ दिया है। महंगाई के इस डर से वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता पैदा हो गई है, जिसका सीधा असर गोल्ड की कीमतों पर पड़ रहा है।

निवेशक मांग में कमी और प्रॉफिट बुकिंग

अंतरराष्ट्रीय बाजार में गोल्ड का भाव $4,130-$4,150 प्रति औंस के सात हफ़्तों के निचले स्तर पर है। इसके साथ ही, गोल्ड ईटीएफ (ETF) से पैसा बाहर निकल रहा है, जो निवेशकों के घटते भरोसे को दर्शाता है। बाजार में प्रॉफिट बुकिंग का दौर जारी है, जिससे कीमतों में लगातार गिरावट देखी जा रही है।

क्या ₹1 लाख का आंकड़ा संभव है?

विशेषज्ञों के अनुसार, फिलहाल सोने के ₹1 लाख प्रति 10 ग्राम से नीचे जाने की संभावना कम है। बाजार के जानकारों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें $3,800-$4,000 प्रति औंस के नीचे नहीं गिरतीं, तो भारत में सोना ₹1.40 लाख से ₹1.60 लाख के बीच स्थिर रह सकता है।

फिलहाल, ₹1.42 लाख से ₹1.46 लाख का स्तर सोने के लिए एक मजबूत सपोर्ट जोन माना जा रहा है। लंबे समय के निवेशकों के लिए मौजूदा गिरावट को एक सुधारात्मक अवसर (Correction) के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, बड़ी गिरावट तभी संभव है जब वैश्विक आर्थिक नीति में कोई बड़ा उलटफेर हो।

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