अब पोल खुल गई है : चुनाव आयोग पर बरसे सौरभ भारद्वाज, CEC की गिरफ्तारी की मांग
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नई दिल्ली: दिल्ली में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच आम आदमी पार्टी (AAP) के वरिष्ठ नेता सौरभ भारद्वाज ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है।

सिर्फ ज्ञानेश कुमार नहीं, पुरानी है गड़बड़ियों की जड़ सौरभ भारद्वाज ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में हेराफेरी का मामला केवल मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार तक सीमित नहीं है। उन्होंने दावा किया कि पूर्व CEC राजीव कुमार के कार्यकाल में भी ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं। उनके अनुसार, 2019 के लोकसभा चुनावों से ही दिल्ली में बड़े स्तर पर मतदाताओं के नाम सूची से हटाने का सिलसिला चल रहा है।

CEC को लिखे गए 14 पत्रों का रहस्य भारद्वाज ने चुनाव आयोग के आंतरिक मतभेदों का मुद्दा उठाया। उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग के अन्य आयुक्तों ने विभिन्न फैसलों को लेकर CEC को करीब 14 बार पत्र लिखे थे। इन पत्रों में आयोग के कुछ फैसलों और फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को गैर-कानूनी और अनधिकृत बताया गया था। भारद्वाज का कहना है कि मौजूदा CEC ने इन पत्रों के अस्तित्व से इनकार नहीं किया है।

मतदाता सूची के डिजिटल खेल पर सवाल आप नेता ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची से जुड़े काम अब पूरी तरह से केंद्रीकृत और कंप्यूटरीकृत हो गए हैं। उन्होंने कहा कि अक्सर लोगों को मतदान के दिन पता चलता है कि उनका नाम सूची से गायब है, जबकि वे दशकों से वोट डालते रहे हैं। उन्होंने इसे एक सोची-समझी साजिश करार दिया है।

देशद्रोह का मुकदमा और दोबारा चुनाव की मांग सौरभ भारद्वाज ने सीधे तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी की मांग की है। उन्होंने कहा कि उन पर देशद्रोह की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज होना चाहिए। साथ ही, भारद्वाज ने मांग की कि SIR प्रक्रिया को तुरंत वापस लिया जाए और जिन राज्यों में इन कथित गड़बड़ियों के बीच चुनाव कराए गए, वहां दोबारा मतदान कराया जाए। इसमें दिल्ली के अलावा हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों का नाम लिया गया है।

सड़कों पर उतरने का आह्वान अंत में, भारद्वाज ने देश के युवाओं और नेताओं से अपील की कि वे चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के खिलाफ एकजुट हों। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस मुद्दे को केवल सोशल मीडिया तक सीमित न रखकर संवैधानिक तरीके से सड़कों पर उतरकर आवाज उठाना अनिवार्य हो गया है।

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