चुनाव आयोग के अंदर महा-कलह : 14 बार आपत्तियों के बावजूद मनमानी का आरोप, 13 करोड़ वोटर्स पर संकट?
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चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर एक बड़ा सियासी बवंडर खड़ा हो गया है। आयोग की एसआईआर (SIR) प्रक्रिया पर अंदरूनी असहमति और गंभीर खुलासों ने निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, आयोग के भीतर ही शीर्ष अधिकारियों के बीच तीखी तनातनी चल रही है।

अंदरूनी विरोध की कहानी चुनाव आयोग के तीन सदस्यीय पैनल में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और अन्य दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी शामिल हैं। सामने आई जानकारी के मुताबिक, संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार मतदाता सूची में हेरफेर से जुड़े मामलों में अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। यह आपत्ति नए वोटर्स के पंजीकरण, नाम हटाने और उन्हें बहाल करने की प्रक्रिया पर जताई गई थी।

प्रशांत भूषण का तीखा प्रहार वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने इस खुलासे को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बाकी दो आयुक्तों की वैध आपत्तियों को दरकिनार करते हुए मनमाने और गैर-कानूनी निर्देश जारी किए। भूषण ने दावा किया कि इन निर्णयों के कारण अब तक 13 करोड़ से अधिक नागरिक अपने मताधिकार से वंचित हो चुके हैं।

तुरंत पद से हटाएं ज्ञानेश कुमार प्रशांत भूषण ने मांग की है कि गंभीर अनियमितताओं को देखते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तुरंत उनके पद से हटा दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी होनी चाहिए। भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि वह इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की जांच करे।

सुप्रीम कोर्ट भी गंभीर यह विवाद नया नहीं है। बिहार और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के दौरान भी एसआईआर प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर निशाना साधा था। अब दिल्ली में भी इसे लेकर विवाद गहरा गया है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत ने भी माना कि बड़ी संख्या में जारी किए गए नोटिस मशीनी प्रतीत होते हैं, जो सीधे तौर पर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करते हैं।

क्या है दांव पर? आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूची के शुद्धिकरण के नाम पर अपनाई जा रही यह प्रक्रिया अब राजनीतिक अखाड़ा बन चुकी है। यदि 13 करोड़ वोटर्स के नाम गायब होने का दावा सच साबित होता है, तो यह देश की चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए एक बड़ा संकट हो सकता है। फिलहाल, चुनाव आयोग की ओर से इन गंभीर आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

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