VIP वोटर्स या विशेष निगरानी ? दिल्ली की वोटर लिस्ट से 79 लाख नाम गायब होने पर मचा बवाल
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दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद मचा सियासी घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में कुल 1.45 करोड़ मतदाताओं में से 79.2 लाख यानी करीब 54.6% मतदाता या तो सूची से हटा दिए गए हैं या जांच के दायरे में हैं। यह संख्या अपने आप में चुनावी पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

क्या अब VIP मतदाताओं की अलग श्रेणी है?

विवाद तब और गहरा गया जब चुनाव आयोग द्वारा जारी नोटिस में VIP/marked electors शब्द का इस्तेमाल किया गया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने चुनाव आयोग पर निशाना साधते हुए पूछा कि क्या देश में अब VIP वोटर और आम वोटर के लिए मताधिकार की अलग-अलग श्रेणियां बना दी गई हैं? उन्होंने संविधान के एक व्यक्ति, एक वोट के सिद्धांत का हवाला देते हुए इसे भेदभावपूर्ण बताया है।

VIP लिस्ट का सच: सुविधा या निगरानी?

चुनाव आयोग की सफाई के अनुसार, VIP शब्द का इस्तेमाल किसी विशेष सुविधा के लिए नहीं किया गया है। चुनावी रिकॉर्ड्स के मुताबिक, VIP लिस्ट में सांसद, विधायक, जज, IAS-IPS अधिकारी और प्रमुख उद्योगपति शामिल होते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों के नाम तकनीकी गड़बड़ी के कारण सूची से न हटें। आयोग का कहना है कि यह एक सॉफ्टवेयर-आधारित प्रक्रिया है, जो सामान्य और VIP दोनों के लिए समान रूप से काम करती है।

बड़े चेहरों को भी भेजा गया नोटिस

SIR की इस प्रक्रिया ने सत्ता के गलियारों में भी हड़कंप मचा दिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस प्रक्रिया में पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, अरविंद केजरीवाल और बांसुरी स्वराज जैसे दर्जनों बड़े नेताओं को भी नोटिस जारी किए गए हैं। इन सभी को 29 अक्टूबर तक अपनी पहचान और निवास संबंधी दस्तावेज जमा कर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।

54.6% वोटर्स पर तलवार

रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। दिल्ली के 14,947 मतदान केंद्रों में से 639 ऐसे बूथ हैं, जहां आधे से ज्यादा मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं। अधिकारियों का तर्क है कि जहां घर गिरे हैं या लोग विस्थापित हुए हैं, वहां सूची में से नाम हटना स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन, जिन 31.6 लाख लोगों को नोटिस भेजा गया है, उनके लिए 29 अक्टूबर की समय सीमा एक बड़ी चुनौती बन गई है।

पारदर्शिता पर उठे सवाल

भले ही चुनाव आयोग बार-बार कह रहा है कि VIP मतदाताओं को मतदान केंद्र पर कोई कतार-मुक्त या विशेष सुविधा नहीं मिलती, लेकिन सवाल प्रक्रिया की निष्पक्षता पर है। क्या एक आम नागरिक और एक नेता के लिए चेक-अप का पैमाना एक ही है? इस पर छिड़ा राजनीतिक विवाद इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में मतदाता सूची की यह कवायद दिल्ली की राजनीति में बड़ा मुद्दा बनने वाली है।

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