इस्लामाबाद बना कंटेनरबाद : पीटीआई के विरोध प्रदर्शन से पहले राजधानी में युद्ध जैसे हालात
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पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद और रावलपिंडी इन दिनों किसी युद्धग्रस्त इलाके की तरह नजर आ रहे हैं। सड़कों पर 1,000 से ज्यादा कंटेनरों की भारी-भरकम किलेबंदी कर दी गई है, जिससे शहर पूरी तरह से लॉकडाउन की स्थिति में है। यह सब इमरान खान की पार्टी पीटीआई (PTI) और जमात-ए-इस्लामी के संभावित प्रदर्शनों को रोकने के लिए किया जा रहा है।

किले में बदली राजधानी शहबाज शरीफ सरकार ने राजधानी को चारों तरफ से घेर लिया है। फैजाबाद इंटरचेंज, डी-चौक और रेड जोन की ओर जाने वाले प्रमुख रास्तों को सील कर दिया गया है। हालात इतने गंभीर हैं कि प्रशासन ने रेड जोन में कंटेनरों को आपस में वेल्डिंग (वेल्ड) कर दिया है, ताकि प्रदर्शनकारी उन्हें हटा न सकें। सड़कों पर लोहे की नुकीली कीलें और मिट्टी के अवरोधक भी बिछाए गए हैं।

धारा 144 और इंटरनेट पर पाबंदी प्रदर्शनों की आहट से डरी सरकार ने राजधानी में धारा 144 लागू कर दी है। इसके साथ ही मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को सीमित किया गया है और मेट्रो बस सेवाओं को भी कई इलाकों में बंद रखा गया है। सुरक्षा बलों की तैनाती चप्पे-चप्पे पर है और पुलिसकर्मियों की 5 अक्टूबर तक सभी छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं। जो कर्मचारी छुट्टी पर थे, उन्हें तत्काल ड्यूटी पर लौटने का फरमान सुनाया गया है।

पुलिस और रेंजर्स का पहरा इस्लामाबाद का डी-चौक सबसे संवेदनशील इलाका माना जाता है, क्योंकि यहीं संसद और प्रधानमंत्री कार्यालय जैसे महत्वपूर्ण सरकारी संस्थान स्थित हैं। सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुलिस के साथ-साथ रेंजर्स को तैनात किया गया है। सरकारी मशीनरी का पूरा जोर इस बात पर है कि प्रदर्शनकारी किसी भी हाल में रेड जोन में प्रवेश न कर सकें।

आम जनता और कारोबार पर मार सड़कों पर कंटेनरों की इस घेराबंदी का खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है। इस्लामाबाद और रावलपिंडी के बीच रोज सफर करने वाले हजारों लोग परेशान हैं और उन्हें लंबा चक्कर काटकर गंतव्य तक पहुंचना पड़ रहा है। परिवहन संघों ने भी इस पर कड़ी आपत्ति जताई है, क्योंकि माल ढुलाई वाले कंटेनरों को पुलिस द्वारा जब्त कर सड़क पर खड़ा कर दिया गया है, जिससे कारोबार पर बुरा असर पड़ रहा है।

सत्ता का डर या सुरक्षा की मजबूरी? पाकिस्तान में राजनीतिक विरोध के दौरान रास्तों को कंटेनरों से बंद करना एक पुराना हथकंडा रहा है। हालांकि, इस बार की तैयारी पहले से कहीं अधिक व्यापक है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह महज सुरक्षा व्यवस्था है या फिर सरकार का अपने राजनीतिक विरोधियों के प्रति गहरा डर? फिलहाल, राजधानी की सड़कों पर पसरा सन्नाटा और सैन्य जैसी सुरक्षा के कड़े इंतजाम सरकार की बढ़ती बेचैनी को साफ जाहिर कर रहे हैं।

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