दुनियाभर में ड्रोन हमलों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। सस्ते और घातक ड्रोन युद्ध के मैदान का समीकरण बदल चुके हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए भारत अब पारंपरिक हथियारों से आगे बढ़कर लेजर तकनीक की ओर कदम बढ़ा चुका है। डीआरडीओ का डायरेक्टेड एनर्जी वेपन (DEW) आने वाले समय में भारतीय सुरक्षा का सबसे मजबूत कवच साबित हो सकता है।
आसान भाषा में समझें तो यह एक लेजर हथियार है। इसमें मिसाइल या बारूद का इस्तेमाल नहीं होता। यह लेजर या माइक्रोवेव के रूप में ऊर्जा की एक केंद्रित किरण छोड़ता है, जो लक्ष्य को बेहद गर्म कर पिघला देती है या उसे पूरी तरह नष्ट कर देती है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें गोला-बारूद खत्म होने का डर नहीं होता और हर वार की लागत बेहद कम आती है।
डीआरडीओ का यह 30 किलोवाट क्षमता वाला सिस्टम खास तौर पर ड्रोन झुंड (Drone Swarms) और निगरानी सेंसरों को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है। यह 5 किलोमीटर की दूरी तक सटीक वार कर सकता है। यह न केवल ड्रोन को गिरा सकता है, बल्कि दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक सेंसर और एंटीना को भी पलक झपकते ही निष्क्रिय कर सकता है।
इस सिस्टम की ताकत का प्रदर्शन 13 अप्रैल 2025 को आंध्र प्रदेश के कुरनूल में स्थित नेशनल ओपन एयर रेंज में किया गया था। टेस्टिंग के दौरान इस लेजर वेपन ने लंबी दूरी से फिक्स्ड-विंग ड्रोन को निशाना बनाया और एक साथ कई ड्रोन हमलों को नाकाम किया। अगस्त 2025 में इसके अंतिम ट्रायल भी सफलतापूर्वक पूरे कर लिए गए हैं।
डीआरडीओ अब इस तकनीक को बड़े स्तर पर उतारने की तैयारी कर रहा है। सितंबर 2026 से अगले छह महीनों के भीतर, संस्थान इसके निर्माण के लिए उद्योग साझेदार (Industry Partner) का चयन करेगा। तकनीक हस्तांतरण (ToT) की मंजूरी मिल चुकी है, जिससे यह हथियार मेक इन इंडिया के तहत भारतीय कंपनियों द्वारा निर्मित किया जाएगा।
मौजूदा युद्धों में एक बड़ी समस्या यह है कि सस्ते ड्रोन को गिराने के लिए लाखों रुपये की मिसाइल खर्च करनी पड़ती है। लेजर हथियार इस समस्या का सबसे सटीक हल हैं। यह रोशनी की गति से काम करते हैं और इन्हें बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है, जो इन्हें आर्थिक रूप से भी बेहद फायदेमंद बनाता है।
हालांकि, लेजर हथियार पूरी तरह निर्बाध नहीं हैं। धूल, बारिश, धुंध और घने बादल लेजर किरण की तीव्रता को कम कर सकते हैं। इसके प्रभावी संचालन के लिए निरंतर बिजली की आपूर्ति और उन्नत कूलिंग सिस्टम की आवश्यकता होती है। साथ ही, लक्ष्य को नष्ट करने के लिए किरण को एक निश्चित समय तक सटीक स्थान पर टिकाए रखने की चुनौती भी बरकरार है। भारतीय सेना में तैनाती के बाद इन पहलुओं पर ही इस हथियार की असली परख होगी।
DRDO is set to begin selecting an industry partner within the next 06 months for its 30kW-class Directed Energy Weapon, moving the indigenous laser weapon closer to its FOPM. 🇮🇳 pic.twitter.com/IRTYgBdHZ3
— Defence Core (@Defencecore) September 21, 2026
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