UPI पर MDR शुल्क: क्या विदेशी दबाव में लिया गया फैसला? सरकार ने दिया दो-टूक जवाब
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यूपीआई (UPI) पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के सरकार के फैसले ने राजनीतिक गलियारों में बहस छेड़ दी है। विपक्षी नेताओं द्वारा विदेशी दबाव के आरोपों के बीच, केंद्र सरकार ने स्थिति स्पष्ट करते हुए इसे डिजिटल भुगतान प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में एक जरूरी कदम बताया है।

विदेशी दबाव के दावों का खंडन हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि यूपीआई पर शुल्क लगाने का निर्णय विदेशी, विशेषकर अमेरिकी दबाव में लिया गया है। सरकार ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। वित्त मंत्रालय का कहना है कि भारत की डिजिटल भुगतान नीति पूरी तरह स्वतंत्र और स्वायत्त है।

क्यों जरूरी है यह नया नियम? सरकार के अनुसार, MDR लागू करने का मुख्य उद्देश्य यूपीआई को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना है। इस राशि का उपयोग बैंक और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स साइबर सुरक्षा को मजबूत करने, धोखाधड़ी रोकने और तकनीकी ढांचे को अपग्रेड करने के लिए करेंगे। इससे सिस्टम की विश्वसनीयता और सुरक्षा बनी रहेगी।

ग्राहकों के लिए खास संदेश: कोई छिपा शुल्क नहीं सरकार ने स्पष्ट किया है कि आम ग्राहकों को घबराने की जरूरत नहीं है। यूपीआई ऐप या पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर किसी भी ग्राहक से कोई प्लेटफॉर्म फीस या हिडन चार्ज नहीं ले सकते। MDR का पूरा बोझ व्यापारी पक्ष पर है; ग्राहक को भुगतान करते समय एक पैसा भी अतिरिक्त नहीं देना होगा।

किसे, कितना और कब देना होगा शुल्क? नया नियम 15 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होगा। इसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:

छोटे व्यापारियों को बड़ी राहत सरकार ने छोटे कारोबारियों के हितों का भी ध्यान रखा है। QR कोड के जरिए होने वाले लेनदेन में हर महीने ₹1 लाख तक के कारोबार पर कोई MDR नहीं लगेगा। इसका सीधा फायदा छोटे दुकानदारों को होगा, जिससे उनका डिजिटल ट्रांजेक्शन का खर्च न्यूनतम बना रहेगा।

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