खाड़ी में जंग के बीच दिल्ली में शांति का हैंडशेक : ईरान और UAE की मुलाकात के क्या हैं मायने?
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नई दिल्ली: ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का मंच केवल आर्थिक सहयोग का माध्यम नहीं बना, बल्कि इसने वैश्विक कूटनीति के एक नए अध्याय को भी जन्म दिया है। भीषण तनाव के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और यूएई के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की दिल्ली में मुलाकात ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है।

दिल्ली बनी डिप्लोमैटिक ब्रिज

पश्चिम एशिया में जारी भारी तनाव और दोनों देशों के बीच पिछले कुछ समय से चल रही कड़वाहट के बीच, भारत की राजधानी में यह मुलाकात बेहद अहम है। यह घटनाक्रम भारत की उस भूमिका को पुख्ता करता है, जिसमें भारत दुनिया के अलग-अलग ध्रुवों को एक मेज पर लाने की क्षमता रखता है।

क्यों तनाव में हैं ईरान और यूएई?

हाल के महीनों में ईरान समर्थित गुटों द्वारा यूएई पर मिसाइल और ड्रोन हमले ने दोनों देशों के रिश्तों में दरार पैदा कर दी थी। यूएई ने इन हमलों को अपनी संप्रभुता के खिलाफ माना है। हालांकि, यूएई ने अपनी सुरक्षा का अधिकार जताते हुए भी यह स्पष्ट किया है कि वह किसी बड़े क्षेत्रीय युद्ध में नहीं उलझना चाहता। नई दिल्ली में हुई यह द्विपक्षीय बातचीत संवाद के दरवाजे खुले रखने की एक बड़ी कोशिश मानी जा रही है।

भारत के लिए शांति क्यों है जरूरी?

भारत BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और उसके दोनों देशों के साथ गहरे हित जुड़े हैं। ईरान के साथ भारत की साझेदारी चाबहार पोर्ट और मध्य एशिया तक कनेक्टिविटी के लिए महत्वपूर्ण है, तो वहीं यूएई भारत का एक प्रमुख रणनीतिक और आर्थिक साझेदार है।

सुलह का रास्ता और भारत की कूटनीति

ब्रिक्स के साझा घोषणापत्र पर ईरान और यूएई की सहमति बनाने में भारत ने पर्दे के पीछे से बड़ी भूमिका निभाई है। भारत के लिए यह शांति इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इस क्षेत्र में कोई भी अस्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों को सीधी चोट पहुंचा सकती है।

दिल्ली में हुए इस हैंडशेक ने यह साबित कर दिया है कि अगर कोई देश बातचीत के लिए ईमानदार मंच मुहैया कराए, तो कूटनीति के जरिए बड़े से बड़े मतभेदों को कम किया जा सकता है। अब देखना यह होगा कि दिल्ली की इस मुलाकात का असर जमीन पर कितना शांतिपूर्ण रहता है।

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