शी जिनपिंग की दिल्ली में बॉडी लैंग्वेज का क्या है मतलब? चीन के बदले रुख के पीछे की इनसाइड स्टोरी
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ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन के लिए दिल्ली पहुंचे चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का स्वागत और उनकी शारीरिक भाषा (बॉडी लैंग्वेज) ने राजनयिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। सीमा विवाद के चलते लंबे समय से तनावपूर्ण रहे भारत-चीन संबंधों में क्या अब बर्फ पिघलने वाली है?

एयरपोर्ट पर दिखी सकारात्मक दस्तक दिल्ली एयरपोर्ट पर जब शी जिनपिंग उतरे, तो उनका स्वागत केंद्रीय राज्यमंत्री जितिन प्रसाद ने किया। इस दौरान शी जिनपिंग का व्यवहार बेहद सहज दिखा। वे न केवल मुस्कुराते हुए दिखे, बल्कि जितिन प्रसाद से लगातार बातचीत भी करते रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन जैसे देश में ऐसे छोटे जेस्चर बहुत मायने रखते हैं और इसे एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

व्यवसाय और कूटनीति का बड़ा एजेंडा पूर्व राजनयिक सुशील सिंघल के मुताबिक, शी जिनपिंग के साथ आए प्रतिनिधिमंडल (डेलीगेशन) में व्यापारियों की मौजूदगी यह स्पष्ट करती है कि चीन आर्थिक संबंधों को प्राथमिकता देना चाहता है। उनके अनुसार, चीन की मंशा साफ है—वह भारत के साथ रिश्तों में आई कड़वाहट को खत्म करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, यह एक लंबी प्रक्रिया होगी, लेकिन शुरुआत उम्मीद जगाने वाली है।

बदले हुए सुर और चीन की सिग्नलिंग कभी भारत पर तीखी टिप्पणी करने वाला चीन का सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स अब अचानक सकारात्मक नजर आ रहा है। दिल्ली के माहौल की तारीफ करना और भारत को लेकर नरम रुख अपनाना, यह सब अचानक नहीं हो रहा है। जानकारों का कहना है कि यह चीन की सोची-समझी सिग्नलिंग है, जिससे वह यह जताना चाहता है कि वह अब संबंधों में सुधार के लिए तैयार है।

भारत का रुख: सावधानी और स्पष्टता भारत भी चीन के साथ संबंधों में सुधार का इच्छुक है, लेकिन ‘सतर्कता’ के साथ। सीमा पर धोखे के पुराने कड़वे अनुभवों को देखते हुए, भारत अपनी सुरक्षा और हितों पर कोई समझौता नहीं करना चाहता। पीएम मोदी और शी जिनपिंग के बीच होने वाली द्विपक्षीय बातचीत ही तय करेगी कि क्या चीन के ये सकारात्मक इरादे केवल दिखावा हैं या इसमें कोई ठोस समाधान छिपा है।

आगे की राह क्या? अगले कुछ घंटों में होने वाली बातचीत बेहद अहम है। विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देशों के बीच 45 मिनट से एक घंटे की बातचीत में ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि दोनों नेता लद्दाख जैसे संवेदनशील मुद्दों पर किस हद तक आगे बढ़ने को तैयार हैं। भारत इस बार फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है, क्योंकि कूटनीति में शब्दों से ज्यादा कार्रवाई का महत्व होता है।

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