यादव या मुसलमान होता तो एनकाउंटर हो जाता : गोंडा हत्याकांड पर पुलिस से क्यों भिड़ गईं काजल निषाद?
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गोंडा के कारोबारी विनोद सहनी हत्याकांड ने उत्तर प्रदेश की राजनीति का तापमान बढ़ा दिया है। इस मामले में समाजवादी पार्टी की नेत्री काजल निषाद का पुलिस अधिकारी से बहस करता वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। उन्होंने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

भेदभावपूर्ण कार्रवाई का आरोप पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचीं काजल निषाद ने पुलिस के सामने तीखे तेवर दिखाए। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि यह हत्या किसी यादव या मुसलमान समुदाय के व्यक्ति की हुई होती, तो अब तक पुलिस न केवल आरोपियों का एनकाउंटर कर चुकी होती, बल्कि उनके घरों पर बुलडोजर भी चल चुका होता। हालांकि, पुलिस अधिकारी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कानून अपना काम कर रहा है और सभी मामलों में समान कार्रवाई की जाती है।

कौन हैं काजल निषाद? काजल निषाद का राजनीतिक सफर पूर्वांचल और गोरखपुर की राजनीति के इर्द-गिर्द घूमता है। सपा के टिकट पर चुनाव लड़कर उन्होंने निषाद समुदाय के बीच अपनी एक पहचान बनाई है। गोंडा कांड के जरिए वह न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल उठा रही हैं, बल्कि निषाद समाज की नाराजगी को अपनी सियासी ताकत बनाने की कोशिश में भी हैं।

संजय निषाद की नाराजगी और बीजेपी की चिंता दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में सरकार के सहयोगी और निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद ने भी पुलिसिया कार्रवाई पर असंतोष जताया और धरने पर बैठ गए। सत्ता पक्ष के भीतर से उठ रही यह मांग बीजेपी के लिए खतरे की घंटी है, क्योंकि पूर्वी यूपी में निषाद, केवट, मल्लाह और बिंद समाज का एक बड़ा वोट बैंक है।

पूर्वांचल में निषाद वोटों का गणित गोरखपुर, बस्ती, संतकबीरनगर से लेकर प्रयागराज और भदोही तक निषाद समाज की आबादी का असर कई सीटों पर निर्णायक होता है। 2022 के विधानसभा चुनाव में निषाद पार्टी के 6 विधायक जीते थे, जो बीजेपी के साथ गठबंधन का हिस्सा हैं। अगर निषाद समाज आरक्षण और सुरक्षा के मुद्दों पर बीजेपी से छिटकता है, तो 2027 के विधानसभा चुनावों में इसका सीधा फायदा विपक्षी दलों को मिल सकता है।

क्या 2027 में बदलेगा समीकरण? हालांकि, केवल एक घटना से बीजेपी का वोट बैंक टूटने का दावा करना जल्दबाजी होगी। लेकिन, अगर काजल निषाद जैसे नेता लगातार इन मुद्दों को उठाकर निषाद समाज के बीच असंतोष को हवा देते रहे, तो पूर्वांचल के सियासी समीकरणों को संभालना बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। फिलहाल, यह देखना अहम होगा कि सरकार इस डैमेज कंट्रोल कैसे करती है।

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