चिन्मय दास और मां के आखिरी पल: बांग्लादेश में मानवता का हुआ क़त्ल
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बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं की स्थिति लगातार दयनीय बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए हिंदू संत चिन्मय कृष्ण दास के साथ जो हुआ, उसने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और बीएनपी नेता तारिक रहमान की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक बेटे का अपनी मरती हुई मां से मिल न पाना न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि इसे एक महापाप के रूप में देखा जा रहा है।

मरती मां की अधूरी हसरत चिन्मय कृष्ण दास की 71 वर्षीय मां, संध्या रानी धर, लंबे समय से बीमार थीं। अस्पताल में भर्ती मां की अंतिम इच्छा सिर्फ इतनी थी कि वे मरने से पहले अपने बेटे का चेहरा देख सकें। परिवार ने प्रशासन से भावुक गुहार लगाई, लेकिन चटगांव प्रशासन ने कानूनी प्रावधान न होने का हवाला देकर इस मानवीय अपील को ठुकरा दिया। मां अपने बेटे की तड़प और जेल की ज्यादतियों के सदमे में दुनिया से विदा हो गईं।

सिर्फ 5 घंटे का क्रूर पैरोल मां के निधन के बाद, प्रशासन ने चिन्मय दास को अंतिम संस्कार के लिए केवल 5 घंटे की पैरोल दी। जब वे भारी सुरक्षा घेरे में पुंडरीक धाम मंदिर पहुंचे, तो वहां का दृश्य विचलित करने वाला था। भगवान राधा-कृष्ण के चरणों में गिरकर बिलखते संत के आंसू विश्व भर के हिंदुओं के लिए एक गहरा घाव बन गए हैं। वे आंसू केवल एक पुत्र के नहीं थे, बल्कि उस दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ थे जिसने एक मां की आखिरी इच्छा को भी कुचल दिया।

कानूनी जाल में फंसा संघर्ष चिन्मय कृष्ण दास पर कुल 6 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। उन पर राष्ट्रद्रोह का आरोप तब लगाया गया जब उन्होंने अल्पसंख्यकों के हक में आवाज उठाई। चार मामलों में जमानत मिलने के बावजूद, उन्हें जेल से बाहर नहीं आने दिया जा रहा है। एक सरकारी वकील की हत्या का मामला भी उन पर थोप दिया गया है, जिससे उनकी रिहाई की राह कठिन हो गई है। आलोचकों का मानना है कि ये मुकदमे पूरी तरह से राजनीतिक साजिश हैं।

तारिक रहमान की भूमिका पर सवाल बांग्लादेश में बीएनपी नेता तारिक रहमान पर अल्पसंख्यकों की आवाज दबाने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। विश्लेषकों का कहना है कि वर्तमान सरकार कट्टरपंथी ताकतों को संरक्षण दे रही है। चिन्मय दास जैसे धार्मिक गुरुओं को निशाना बनाना इस बात का प्रमाण है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के लिए शांतिपूर्ण ढंग से अपनी सुरक्षा की मांग करना भी एक अपराध माना जा रहा है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठती आवाजें चिन्मय दास के साथ हुए इस अमानवीय व्यवहार की गूंज अब वैश्विक मंचों तक पहुंच चुकी है। भारत सहित कई देशों में मानवाधिकार संगठनों ने इस घटना की निंदा की है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे उनके रोते हुए वीडियो ने दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। अब मांग उठ रही है कि चिन्मय दास के खिलाफ दर्ज फर्जी मुकदमों को तुरंत वापस लिया जाए। यह घटना साफ करती है कि बांग्लादेश की सत्ता में बैठे लोगों को आने वाले समय में इन आंसुओं और इस प्रशासनिक क्रूरता का हिसाब देना ही होगा।

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