ब्रिक्स 2026: सऊदी अरब और यूएई ने क्यों थामा ब्रिक्स का हाथ? बदलती वैश्विक राजनीति का पूरा गणित
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नई दिल्ली में ब्रिक्स के 18वें शिखर सम्मेलन का आगाज हो चुका है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत दुनिया के दिग्गज नेता इस मंच पर जुटे हैं। चर्चाओं के केंद्र में है—ग्रुप का विस्तार। सवाल यह है कि दुनिया के तेल और गैस के सबसे बड़े भंडार वाले देश सऊदी अरब और यूएई आखिर ब्रिक्स में क्यों शामिल हुए?

पश्चिमी निर्भरता से आजादी की तलाश

सऊदी अरब और यूएई लंबे समय तक अमेरिका और पश्चिमी देशों के सुरक्षा छाते के नीचे रहे हैं। हथियारों से लेकर वित्त तक, वे पश्चिम पर निर्भर थे। लेकिन बदलते वैश्विक समीकरणों ने उन्हें जोखिम भांपने पर मजबूर कर दिया। अब ये देश किसी एक महाशक्ति पर निर्भर रहने के बजाय अपनी विदेश नीति को स्वतंत्र और बहुध्रुवीय बना रहे हैं। ब्रिक्स उन्हें पश्चिम के समानांतर एक मजबूत विकल्प प्रदान करता है।

ऊर्जा बाजार का नया विस्तार

सऊदी अरब और यूएई के लिए भारत और चीन सबसे बड़े ग्राहक हैं। ब्रिक्स में शामिल होकर, ये देश ऊर्जा उत्पादक और उपभोक्ता के बीच एक सीधा और सुरक्षित मंच तैयार कर रहे हैं। यदि भविष्य में पश्चिमी देशों में ऊर्जा की मांग घटती है या राजनीतिक दबाव बढ़ता है, तो ब्रिक्स के भीतर मौजूद एशियाई बाजार उन्हें सुरक्षित निर्यात का भरोसा देता है।

डॉलर पर निर्भरता कम करने की चाल

ब्रिक्स मंच पर लगातार स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने की बात हो रही है। सऊदी अरब और यूएई का पूरा तेल व्यापार दशकों से अमेरिकी डॉलर में होता रहा है। हालांकि वे रातों-रात डॉलर नहीं छोड़ेंगे, लेकिन ब्रिक्स के सदस्य बनकर वे अपनी भुगतान प्रणाली में विविधता ला रहे हैं। इससे भविष्य में किसी एक वित्तीय व्यवस्था पर उनकी निर्भरता कम होगी और मौद्रिक सुरक्षा बढ़ेगी।

आर्थिक विविधीकरण का नया विजन

सऊदी का विजन 2030 और यूएई की विकास योजनाएं तेल से परे निवेश चाहती हैं। उन्हें भारत की तकनीक, चीन की विनिर्माण क्षमता और ब्राजील की कृषि शक्ति की जरूरत है। ब्रिक्स में आने से उन्हें इन देशों से निवेश आकर्षित करने और अपनी अर्थव्यवस्था को पर्यटन, नवीकरणीय ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में बदलने का बड़ा मौका मिल रहा है।

पश्चिम एशिया में कूटनीतिक संतुलन

ब्रिक्स में ईरान का होना और सऊदी अरब का वहां पहुंचना, क्षेत्र की राजनीति के लिए एक बड़ा बदलाव है। दोनों क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन ब्रिक्स का मंच उन्हें संवाद के लिए एक तटस्थ जगह देता है। वहीं, यूएई की नीति सभी महाशक्तियों के साथ मित्रतापूर्ण संबंध बनाए रखने की है, जिसे ब्रिक्स-सदस्यता से और अधिक मजबूती मिली है।

क्या यह अमेरिका-विरोधी कदम है?

इसे सीधे तौर पर अमेरिका का विरोध नहीं माना जा सकता। ब्रिक्स का स्वरूप पश्चिम-विरोधी होना नहीं, बल्कि विकासशील देशों की आवाज बनना है। भारत जैसे देश, जो अमेरिका के भी रणनीतिक साझेदार हैं, इस मंच पर सक्रिय हैं। सऊदी और यूएई केवल अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। वे पश्चिम के साथ अपने सुरक्षा संबंध भी बरकरार रखेंगे और पूरब के साथ आर्थिक सहयोग भी बढ़ाएंगे।

संक्षेप में, सऊदी अरब और यूएई का यह कदम केवल सदस्यता नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और स्वतंत्र भविष्य के लिए चली गई रणनीतिक चाल है।

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