क्या चीन को झुकने पर मजबूर कर दिया डोवल डॉक्ट्रिन ने? ब्रिक्स समिट में जिनपिंग का आना एक सोची-समझी रणनीति
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भारत में आयोजित होने वाली ब्रिक्स (BRICS) समिट को लेकर बनी सभी अटकलें अब समाप्त हो चुकी हैं। बीजिंग ने आधिकारिक पुष्टि कर दी है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 12-13 सितंबर को दिल्ली पहुंच रहे हैं। गलवान विवाद के बाद यह उनका पहला भारत दौरा है, जो कई मायनों में ऐतिहासिक और कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

चीन की चुप्पी और मजबूरी का गणित

पिछले 7 सालों में चीन ने भारत के साथ अपने संबंधों में तल्खी बरकरार रखी थी, लेकिन इस बार जिनपिंग का आना उनकी कूटनीतिक मजबूरी माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वे भारत नहीं आते, तो अगले साल ब्रिक्स की अध्यक्षता चीन को संभालनी है, जो उनके लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित होता। साथ ही, ग्लोबल साउथ में भारत का बढ़ता प्रभाव और चीन का अलग-थलग पड़ना उन्हें दिल्ली की मेज तक खींच लाया है।

डोवल डॉक्ट्रिन : जिसने ड्रैगन को बैकफुट पर धकेला

इस दौरे के पीछे सबसे बड़ा कारण डोवल डॉक्ट्रिन को माना जा रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवल की रणनीति ने चीन को यह एहसास दिलाया कि भारत अब अपनी संप्रभुता के साथ समझौता नहीं करेगा। 2020 के बाद से रक्षात्मक-आक्रमकता (Defensive-Offensive) की नीति के तहत सीमा पर सेना की तैनाती, चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध और निवेश के कड़े नियमों ने चीन को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि भारत जैसे बड़े बाजार को नजरअंदाज करना अब संभव नहीं है।

भारत की शर्तें: क्या होगा समिट का एजेंडा?

भारत ने इस बार ब्रिक्स समिट के एजेंडे में काफी बदलाव किए हैं। चीन की ब्रिक्स करेंसी और व्यापारिक ढांचे पर एकाधिकार की मांग को भारत ने सिरे से खारिज कर दिया है। इसके बजाय, भारत ने सप्लाई चेन के वैकल्पिक रूट और चीन पर निर्भरता कम करने जैसे विषयों को प्राथमिकता दी है। 12 सितंबर को होने वाली पीएम मोदी और शी जिनपिंग की द्विपक्षीय वार्ता में एलएसी (LAC) पर पूर्ण वापसी, सीधी उड़ानों की बहाली और कैलाश मानसरोवर यात्रा पर अहम चर्चा संभव है।

16 देशों के प्रमुख और एक बड़ा भू-राजनीतिक संदेश

दिल्ली में आयोजित इस सम्मेलन में 11 सदस्य देशों के अलावा 10 आमंत्रित देश भी शामिल हो रहे हैं। व्लादिमीर पुतिन और मसूद पेजेशकियान जैसे नेताओं की मौजूदगी यह संकेत देती है कि दुनिया अब केवल अमेरिकी डॉलर और पश्चिमी फैसलों पर निर्भर रहने को तैयार नहीं है।

भारत इस मंच का उपयोग अपनी डिजिटल तकनीक (UPI, आधार) को साझा करने और ग्लोबल साउथ की आर्थिक प्राथमिकताओं को मुखर करने के लिए करेगा। युद्धों से घिरी दुनिया में, दिल्ली की यह बैठक शांति और आपसी सहयोग का एक नया अध्याय लिखने की कोशिश करेगी। यह समिट साबित करती है कि भारत अब वैश्विक राजनीति में एक ऐसा केंद्र बन चुका है, जिसे नजरअंदाज करना किसी भी महाशक्ति के लिए नामुमकिन है।

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