7 साल बाद आमने-सामने मोदी और शी: क्या बदल गए हैं भारत-चीन रिश्ते?
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सस्पेंस खत्म हो चुका है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस सप्ताहांत (12-13 सितंबर) नई दिल्ली में होने वाले 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आ रहे हैं। बीजिंग ने आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि कर दी है। सात साल के लंबे अंतराल के बाद शी जिनपिंग की यह भारत यात्रा कूटनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है।

2019 की मामल्लापुरम मुलाकात और उसके बाद की हलचल

अक्टूबर 2019 में जब शी जिनपिंग तमिलनाडु के मामल्लापुरम आए थे, तब माहौल काफी अलग था। मंदिर नगरी की उस अनौपचारिक बैठक का मुख्य उद्देश्य दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत तालमेल और भरोसा बढ़ाना था। हालांकि, उस मुलाकात के कुछ ही महीनों बाद जून 2020 में गलवान घाटी की हिंसक झड़प ने सब कुछ बदल दिया।

गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के राजनयिक संबंध ठप हो गए और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सैन्य तनाव चरम पर पहुंच गया। पिछले सात वर्षों में भारत-चीन व्यापार घाटा 11 अरब डॉलर से बढ़कर 112 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो दोनों देशों के बीच आर्थिक असंतुलन को स्पष्ट करता है।

इस बार कूटनीतिक चुनौतियां और भी जटिल हैं

इस बार की बैठक केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है। शिखर सम्मेलन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन की मौजूदगी इसे और चुनौतीपूर्ण बनाती है। यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच, पीएम मोदी के सामने कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की कड़ी परीक्षा होगी।

खासकर ट्रंप प्रशासन की आक्रामक टैरिफ नीतियों और बिगड़ती वैश्विक सप्लाई चेन के दौर में, भारत और चीन के लिए साथ काम करने की मजबूरी और आवश्यकता दोनों बढ़ गई हैं। हालांकि, सीमा विवाद और व्यापार घाटा जैसे पुराने मुद्दे अभी भी संबंधों में बड़ी बाधा बने हुए हैं।

क्या इस बार निकलेगा कोई ठोस नतीजा?

2019 की मुलाकात में जहां सिर्फ बातचीत और भविष्य की योजना पर जोर था, वहीं 2026 की यह बैठक एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि सीमा पर हालिया सैनिकों की वापसी और बढ़ते वैश्विक दबाव के बीच दोनों नेता व्यापारिक और रणनीतिक मोर्चों पर किसी ठोस सहमति की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

क्या शी जिनपिंग की यह यात्रा संबंधों में जमी बर्फ को पिघला पाएगी? वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए, दोनों देशों के पास एक-दूसरे के करीब आने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है, लेकिन भरोसे की कमी इस बार भी सबसे बड़ा सवाल बनी हुई है। नई दिल्ली में होने वाली यह बैठक तय करेगी कि आने वाले समय में ड्रैगन और भारत के बीच का रिश्ता किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

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