डेटा का दम: क्या अब कंप्यूटर तय करेगा टीम इंडिया की प्लेइंग XI?
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क्रिकेट अब सिर्फ मैदान पर पसीने बहाने का खेल नहीं रह गया है। आधुनिक क्रिकेट में खिलाड़ी के चयन का तरीका पूरी तरह बदल चुका है। अब किसी बल्लेबाज के रन या गेंदबाज के विकेट ही पैमाना नहीं हैं, बल्कि डेटा और स्पोर्ट्स साइंस तय कर रहे हैं कि मैदान पर कौन उतरेगा।

डेटा से मापी जाती है बल्लेबाज की असली क्षमता

आज के दौर में सूर्यकुमार यादव जैसे बल्लेबाजों का आकलन सिर्फ कुल रनों से नहीं होता। बीसीसीआई के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CoE) में यह देखा जाता है कि खिलाड़ी पावरप्ले, डेथ ओवर्स और अलग-अलग तरह की गेंदबाजी (तेज या स्पिन) के खिलाफ कैसा प्रदर्शन करता है। यह डेटा बताता है कि खिलाड़ी की असली ताकत और कमजोरी क्या है।

कमजोरी का फायदा उठाती हैं विपक्षी टीमें

आधुनिक क्रिकेट में रणनीतियां डेटा के आधार पर बनती हैं। यदि कोई बल्लेबाज किसी खास तरह की गेंदबाजी के खिलाफ संघर्ष करता है, तो विपक्षी टीम उसी डेटा का उपयोग करके जाल बुनती है। हालांकि, विराट कोहली जैसे दिग्गजों के खिलाफ पुराना रिकॉर्ड सिर्फ एक संकेत होता है; डेटा से मिली जानकारी रणनीति बनाने में मदद तो करती है, लेकिन मैदान का अंतिम नतीजा खिलाड़ी के आत्मविश्वास पर निर्भर करता है।

हर मैच के लिए अलग गणित

टीम चयन का सवाल अब यह नहीं है कि सबसे अच्छा खिलाड़ी कौन है , बल्कि यह है कि इस पिच और इस स्थिति के लिए सबसे उपयोगी खिलाड़ी कौन है? तेज पिचों पर अतिरिक्त तेज गेंदबाज और धीमी पिचों पर स्पिनरों की उपयोगिता का आकलन भी आंकड़ों के जरिए ही किया जाता है। यही कारण है कि टीम का संयोजन हर मैच के साथ बदलता रहता है।

बुमराह जैसे गेंदबाजों के लिए वर्कलोड मैनेजमेंट

तेज गेंदबाजों के लिए फिटनेस सबसे बड़ी चुनौती है। बीसीसीआई उनके वर्कलोड (काम के बोझ) पर बारीकी से नजर रखता है। जसप्रीत बुमराह जैसे गेंदबाजों को कब आराम देना है और कब मैदान में उतारना है, यह उनके शरीर की रिकवरी रेट और जीपीएस तकनीक से मिले आंकड़ों के आधार पर तय किया जाता है। यह तकनीक चोटों को रोकने और करियर को लंबा खींचने में मदद करती है।

क्या कंप्यूटर कप्तान की जगह ले लेगा?

यह सवाल अक्सर उठता है कि क्या अब फैसले मशीनें लेंगी? इसका जवाब है—नहीं। कंप्यूटर या डेटा का काम कप्तान, कोच और चयनकर्ताओं का विकल्प बनना नहीं है। बल्कि, यह उन्हें सटीक जानकारी देकर बेहतर फैसला लेने में मदद करता है। अंतिम फैसला आज भी मैदान पर कप्तान और सपोर्ट स्टाफ ही लेते हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि अब उनके पास अपनी बात साबित करने के लिए ठोस वैज्ञानिक आधार मौजूद है।

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