दिल्ली यूनिवर्सिटी का हॉस्टल संकट : हजारों छात्र बेघर, क्या हादसों का इंतज़ार कर रहा प्रशासन?
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दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र एक बड़े संकट से जूझ रहे हैं। देश भर से मेधावी छात्र यहाँ पढ़ने तो आते हैं, लेकिन कैंपस के अंदर उन्हें सिर छिपाने के लिए छत नसीब नहीं होती। सत्य निकेतन हादसे के बाद यह सवाल और गहरा गया है कि आखिर इन हजारों छात्रों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?

5300 छात्र, 18 कोर्स, लेकिन एक भी हॉस्टल नहीं

साउथ कैंपस का आत्माराम सनातन धर्म (ARSD) कॉलेज इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहाँ 5300 से अधिक छात्र 18 अलग-अलग कोर्सों में पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन कॉलेज के पास एक भी बॉयज या गर्ल्स हॉस्टल नहीं है। चौंकाने वाली बात यह है कि तीन साल पहले हॉस्टल निर्माण की योजना बनी थी, जमीन भी तय हो गई थी, लेकिन फाइल आज भी दफ्तरों में धूल फांक रही है। इसी कॉलेज के वे छात्र सत्य निकेतन हादसे का शिकार हुए, जिन्होंने कैंपस से दूर निजी पी.जी. में पनाह ली थी।

नाममात्र की सीटें, कड़ी प्रतिस्पर्धा

जहाँ हॉस्टल मौजूद भी हैं, वहां की स्थिति और भी दयनीय है। श्री वेंकटेश्वर कॉलेज को ही लें, यहाँ 4346 छात्र हैं, लेकिन हॉस्टल की सीटें महज 150 हैं। इस साल 2000 छात्रों ने दाखिला लिया, जिनमें से केवल 35 को हॉस्टल मिल सका। स्थिति यह है कि एक कोर्स से बमुश्किल दो छात्रों को सीट मिल पाती है। यहाँ तक कि दिव्यांग और दृष्टिबाधित छात्रों के लिए भी आरक्षण और सुविधाएं ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं।

बिना हॉस्टल वाले कॉलेजों की लंबी फेहरिस्त

साउथ कैंपस और कालकाजी क्षेत्र के अधिकांश कॉलेज बिना हॉस्टल के ही चल रहे हैं। मोतीलाल नेहरू, राम लाल आनंद, आर्यभट्ट, डी.सी.ए.सी., जीसस एंड मैरी, शहीद भगत सिंह, गार्गी और दयाल सिंह जैसे प्रमुख कॉलेजों के पास छात्रों को देने के लिए अपना कोई आवास नहीं है। कैंपस के बाहर रहने के लिए मजबूर इन छात्रों को अब महंगे और असुरक्षित पी.जी. या किराए के कमरों का सहारा लेना पड़ता है।

सत्य निकेतन हादसा: खौफ के साये में पढ़ाई

सत्य निकेतन की घटना ने छात्रों में सुरक्षा का डर पैदा कर दिया है। हादसे की शिकार हुई इमारतों के पास रहने वाले छात्र अब घबराए हुए हैं। एक छात्रा ने बताया कि कैसे उसने अपनी आँखों के सामने साथियों को मरते देखा और बाल-बाल बची। इन छात्रों का सीधा सवाल है—क्या उन्हें बेहतर और सुरक्षित शिक्षा का अधिकार नहीं है? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद ही नींद से जागेगा?

शिक्षा के केंद्र कहे जाने वाले दिल्ली में हॉस्टल की यह कमी न केवल छात्रों की जेब पर भारी पड़ रही है, बल्कि अब यह उनके जीवन की सुरक्षा के लिए खतरा भी बन गई है। क्या दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास अपनी आधारभूत संरचना को सुधारने का कोई ठोस रोडमैप है, या छात्र भविष्य में भी इसी तरह बदहाल कमरों में मौत के साये में रहने को मजबूर रहेंगे?

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