भारत-चीन संबंधों का सबसे बड़ा लिटमस टेस्ट : क्या दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन में पिघलेगी लद्दाख की बर्फ?
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एशिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियों—भारत और चीन—के बीच का रिश्ता सालों से एक नाजुक मोड़ पर अटका हुआ है। दोनों देशों को एक-दूसरे की जरूरत है, लेकिन आपसी अविश्वास की दीवार इतनी ऊंची है कि कोई भी दूसरे की नीयत पर भरोसा करने को तैयार नहीं है। अब दिल्ली में होने जा रहा ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन इस उलझे हुए रिश्ते के लिए एक निर्णायक परीक्षा है।

गलवान का साया और देपसांग की नई उम्मीद जून 2020 की गलवान घाटी की खूनी झड़प के बाद दोनों देशों के रिश्ते दशकों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे। एलएसी (LAC) पर तनाव के कारण भारत ने चीनी निवेश और ऐप्स पर कड़े प्रतिबंध लगाए। नई दिल्ली का रुख स्पष्ट था—सीमा पर शांति के बिना सामान्य व्यापार संभव नहीं।

अक्टूबर 2024 में पूर्वी लद्दाख के देपसांग और डेमचोक में पेट्रोलींग को लेकर बनी सहमति ने जरूर उम्मीद जगाई है। कज़ान में हुई मोदी-शी वार्ता से कूटनीतिक रास्ते फिर खुले हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह महज एक अस्थायी समझौता है या टिकाऊ शांति की शुरुआत?

ब्रिक्स: क्या है दोनों देशों का असली मकसद? ब्रिक्स उन चुनिंदा मंचों में से है जहाँ भारत और चीन सैन्य प्रतिद्वंद्वी के बजाय उभरती अर्थव्यवस्थाओं के भागीदार के रूप में दिखते हैं।

दोनों के उद्देश्य अलग हैं, लेकिन साझा मंच पर साथ बैठना उनकी मजबूरी और जरूरत दोनों है।

अमरीका का एंगल और भारत की बारीक चाल दिल्ली की विदेश नीति अब मल्टी-एंगेजमेंट पर आधारित है। भारत ने क्वाड (QUAD) के जरिए अमेरिका से रक्षा संबंध मजबूत किए हैं, लेकिन इसे कभी चीन विरोधी गुट नहीं बनने दिया। भारत एक ऐसी बहुध्रुवीय दुनिया चाहता है जहाँ चीन का एकछत्र राज न हो। दूसरी ओर, चीन अमेरिका के इंडो-पैसिफिक प्लान को अपने लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है। भारत की चुनौती यही है कि वह चीन के साथ व्यापारिक संतुलन भी बनाए रखे और अपनी राष्ट्रीय अखंडता से समझौता भी न करे।

सुरक्षा बनाम व्यापार: क्या बदलेगी नीति? आर्थिक मोर्चे पर भारत अब भी चीनी मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक्स पर काफी हद तक निर्भर है। हालांकि, हाल ही में UPI और चीनी पेमेंट गेटवे के गठजोड़ पर लगी रोक यह बताती है कि भारत डेटा सुरक्षा और साइबर फ्रॉड के मामलों में कोई ढील नहीं देगा। खबर है कि आगामी बातचीत में भारतीय अधिकारी निवेश नियमों पर कुछ नरमी दिखा सकते हैं, लेकिन यह पूरी तरह से सुरक्षा आकलन पर आधारित होगा।

क्या प्रतिस्पर्धा के साथ सह-अस्तित्व ही भविष्य है? सच यह है कि हिंद महासागर से लेकर पाकिस्तान तक भारत और चीन के बीच प्रभाव जमाने की होड़ जारी रहेगी। इसलिए, पुरानी दोस्ती की उम्मीद के बजाय प्रतिस्पर्धात्मक सह-अस्तित्व (Competitive Coexistence) सबसे व्यावहारिक रास्ता है।

दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन की असली कामयाबी हाथ मिलाने या फोटो खिंचवाने में नहीं, बल्कि इस बात में है कि भविष्य में सीमा पर किसी भी तनाव को रोकने के लिए दोनों देश कितना मजबूत गार्डरेल (सुरक्षा घेरा) बना पाते हैं। 3,488 किलोमीटर लंबी विवादित सीमा साझा करने वाले दो परमाणु पड़ोसियों के लिए एक-दूसरे का नियमों से चलने वाला प्रतिद्वंद्वी बनना ही शायद फिलहाल सबसे समझदारी भरी दोस्ती है।

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