5253वाँ श्रीकृष्ण जन्मोत्सव: जब पृथ्वी का भार हरने के लिए स्वयं परमेश्वर ने लिया मानव अवतार
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आज पूरी दुनिया में 5253वें श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की धूम है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र के पावन संयोग में मध्यरात्रि को मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिस क्षण भगवान ने अपनी देह का त्याग किया, उसी समय से कलयुग का आरंभ माना जाता है।

क्यों धरा पर पधारे स्वयं भगवान?

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, श्रीकृष्ण का अवतार मात्र कंस का वध करने के लिए नहीं था। उनका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी पर बढ़े अधर्म और निरंकुश राजाओं के बोझ को हल्का करना था। वे धर्म की स्थापना और सज्जनों की रक्षा के लिए मानव रूप में अवतरित हुए थे।

वसुदेव-देवकी के तप का फल

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, पूर्वजन्म में वसुदेव और देवकी ने सूतपा और पृश्नि के रूप में हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। भगवान विष्णु ने स्वयं उन्हें वरदान दिया था कि वे उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। त्रेता युग में श्रीराम के बाद, द्वापर में वे श्रीकृष्ण के रूप में वसुदेव-देवकी के आठवें पुत्र बने।

कंस का अंत और असुरों का नाश

कंस ने अपने डर से देवकी की छह संतानों की हत्या कर दी थी, जबकि सातवें गर्भ के रूप में शेषनाग (बलराम) ने जन्म लिया, जिन्हें योगमाया ने सुरक्षित स्थानांतरित कर दिया। आठवें पुत्र के रूप में जन्मे श्रीकृष्ण ने अपनी अल्पायु में ही कंस के आतंक को समाप्त कर दिया।

मथुरा की रंगभूमि में मात्र 12 वर्ष की आयु में उन्होंने न केवल कुवलयापीड नामक हाथी का वध किया, बल्कि चाणूर और मुष्टिक जैसे शक्तिशाली पहलवानों को धूल चटाकर अत्याचारी कंस को उसके सिंहासन से खींचकर मृत्युदंड दिया।

प्रमुख असुरों का संहार

श्रीकृष्ण और बलराम ने अपनी बाल और किशोरावस्था के दौरान पूतना, तृणावर्त, बकासुर, अघासुर, धेनुकासुर, प्रलंबासुर, अरिष्टासुर, केशी और व्योमासुर जैसे कई महाक्रूर राक्षसों का अंत किया। इसके बाद उन्होंने नरकासुर, कालयवन, जरासंध और शिशुपाल जैसे अत्याचारियों का संहार कर धर्म की पुनः स्थापना की।

125 वर्षों की अलौकिक लीला

Vedic पंचांग और भागवत पुराण की गणना के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर कुल 125 वर्ष, 8 माह और 7 दिन बिताए। आज 5253वें जन्मोत्सव पर उनकी लीलाएं और गीता का ज्ञान न केवल भारत बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का एकमात्र स्रोत है। आज का दिन यह स्मरण करने का है कि जब-जब धर्म की हानि होती है, परमात्मा स्वयं किसी न किसी रूप में मार्गदर्शन के लिए अवश्य आते हैं।

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