बलिया: सड़क पर गिरते-पड़ते स्कूल जाने वाली बलिया की मासूम रागिनी को अब एक नई पहचान और सहारा मिल गया है। उसे ट्राईसाइकिल मिल चुकी है, साथ ही प्रशासन ने घर तक सड़क और पीएम आवास देने का भरोसा भी दिया है। लेकिन इस राहत के बीच एक कड़वा सच यह है कि रागिनी की मां पर इलाज का भारी कर्ज चढ़ा हुआ है।
हादसे ने छीना पैर, पर नहीं टूटा हौसला छह साल पहले एक सड़क हादसे में रागिनी ने अपना बायां पैर खो दिया था। बाइक की चपेट में आने के बाद उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। चलना-फिरना दूभर हो गया, लेकिन पढ़ाई के प्रति उसकी दीवानगी कम नहीं हुई। वह रोज स्कूल जाती रही, रास्ते में बार-बार गिरती रही, लेकिन हिम्मत नहीं हारी।
इलाज के लिए बेचे गहने, कर्ज में डूबा परिवार बेटी को फिर से पैरों पर खड़ा करने के लिए मां ने अपनी पूरी जमा-पूंजी दांव पर लगा दी। बनारस से लेकर मऊ तक के अस्पतालों में इलाज कराया, लेकिन रागिनी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो सकी। इस कोशिश में मां ने अपने गहने बेच दिए, स्वयं सहायता समूह से एक लाख का लोन लिया और गांव के लोगों से भी उधार लिया। आज परिवार पर कुल चार लाख रुपये का कर्ज है।
प्रशासन की मदद से मिली नई राह रागिनी के संघर्ष की कहानी जब बलिया के डीएम मंगला प्रसाद सिंह तक पहुंची, तो प्रशासनिक अमला हरकत में आया। सिकंदरपुर के संजय सिंह ने बच्ची को ट्राईसाइकिल भेंट की, जिससे अब उसका आवागमन सुगम हो गया है। प्रशासन ने परिवार को पीएम आवास और घर तक पक्की सड़क बनवाने का ठोस आश्वासन दिया है।
मां के माथे पर अभी भी चिंता की लकीरें बेटी को चलने का सहारा तो मिल गया, लेकिन मां का संघर्ष अभी थमा नहीं है। पिता रोजी-रोटी के लिए परदेश में हैं और पीछे मां चार लाख रुपये के कर्ज के बोझ तले दबी है। रागिनी के चेहरे पर तो मुस्कान लौट रही है, लेकिन मां अब भी उस कर्ज से निकलने का रास्ता तलाश रही है, जो उसने अपनी बेटी के भविष्य को बचाने के लिए लिया था।
यह कहानी केवल एक बच्ची के हौसले की नहीं, बल्कि उस मां के बलिदान की भी है जिसने अपनी सुरक्षा से ज्यादा अपनी औलाद को प्राथमिकता दी। अब देखना यह है कि सरकारी मदद के साथ क्या कोई और हाथ भी इस परिवार की आर्थिक मुश्किलों को कम करने के लिए आगे आता है या नहीं।
*बलिया की रागिनी को मिली ट्राईसाइकिल, सड़क और आवास का भरोसा, लेकिन मां पर अब भी 4 लाख का कर्ज
— Prabhat Khabar (@prabhatkhabar) September 3, 2026
सड़क हादसे में पैर प्रभावित होने के बावजूद रागिनी ने पढ़ाई नहीं छोड़ी. बेटी के इलाज और पढ़ाई के लिए मां ने गहने बेचे और कर्ज लिया. अब रागिनी को ट्राईसाइकिल और सरकारी मदद का भरोसा मिला… pic.twitter.com/gSbw4idkQ7
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