गांव-गांव में बैंकिंग क्रांति: 50 हजार बैंक सखियां और जनधन योजना ने बदली करोड़ों महिलाओं की तकदीर
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ग्रामीण भारत में वित्तीय समावेश का नया दौर केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री जनधन योजना ने पिछले एक दशक में देश की तस्वीर बदल दी है। इस योजना का सबसे बड़ा प्रभाव ग्रामीण महिलाओं पर पड़ा है। अब बैंकिंग सुविधाएं केवल बड़े शहरों या बैंक शाखाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गांव की दहलीज तक पहुंच गई हैं।

50,000 बैंक सखियों की अनूठी भूमिका बैंकिंग सेवाओं को घर-घर पहुंचाने के लिए ग्राम पंचायतों में 50,000 से अधिक बैंक सखियों की नियुक्ति की गई है। ये सखियां न केवल लेनदेन में मदद कर रही हैं, बल्कि महिलाओं को क्रेडिट और सरकारी योजनाओं की जानकारी देकर उन्हें आत्मनिर्भर बना रही हैं। बैंकिंग और ग्रामीण महिलाओं के बीच की दूरी को मिटाने में इनकी भूमिका निर्णायक है।

आर्थिक आजादी की मजबूत नींव 28 अगस्त 2014 को शुरू हुई जनधन योजना ने महिलाओं को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा है। आज करोड़ों महिलाओं के पास अपना खुद का बैंक खाता है, जिसने उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाया है। अब सरकारी सहायता (DBT) सीधे उनके खातों में पहुंचती है, जिससे बिचौलियों का खेल खत्म हो गया है और पारदर्शिता बढ़ी है।

अंकों में देखिए क्रांति: 43% से 89% का सफर आंकड़े इस बदलाव की गवाही देते हैं। 2014 में देश में केवल 43 प्रतिशत महिलाओं के पास बैंक खाता था, जो 2024 तक बढ़कर 89 प्रतिशत हो गया है। दिलचस्प बात यह है कि इस अवधि में पुरुषों के बैंक खाता स्वामित्व का आंकड़ा 62 से 88 प्रतिशत तक पहुंचा है। यानी, महिलाओं की वित्तीय भागीदारी में वृद्धि की रफ्तार पुरुषों से कहीं अधिक तेज रही है।

संकट में बनीं मददगार कोरोना महामारी जैसे कठिन समय में जनधन खातों की अहमियत पूरी दुनिया ने देखी। सरकार ने 20 करोड़ से अधिक महिला जनधन खाताधारकों के खातों में सीधे आर्थिक मदद भेजी। समय पर मिली इस सहायता ने लाखों परिवारों को संकट से उबारने में बड़ी भूमिका निभाई।

आत्मनिर्भरता की ओर कदम जनधन योजना ने महिलाओं को केवल खाताधारक नहीं, बल्कि अपने वित्तीय निर्णयों का मालिक बनाया है। बचत करना, भविष्य की योजना बनाना और जरूरत पड़ने पर ऋण लेना अब ग्रामीण महिलाओं के लिए आसान हो गया है। यह वित्तीय समावेश न केवल उनकी व्यक्तिगत प्रगति का आधार है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती का भी प्रतीक है।

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