यूपी पंचायत चुनाव की मांग को लेकर लखनऊ में बवाल, प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी
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लखनऊ में सड़क पर उतरीं प्रधान प्रत्याशियों की उम्मीदें उत्तर प्रदेश में आगामी पंचायत चुनाव को लेकर संभावित प्रत्याशियों का इंतजार अब आक्रोश में बदल गया है। रविवार को अखिल भारतीय प्रधान संगठन के बैनर तले बड़ी संख्या में संभावित प्रत्याशी राजधानी लखनऊ में सड़कों पर उतर आए। वे समय पर चुनाव कराने की मांग को लेकर दारुलशफा से विधानसभा की ओर कूच कर रहे थे।

पुलिस के साथ झड़प और हिरासत विधानसभा की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने रास्ते में ही रोक दिया। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की और तीखी झड़प हुई। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया और उन्हें बसों में भरकर ईको गार्डन भेज दिया। प्रदर्शन के दौरान सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी भी हुई।

गांव की सत्ता के दावेदार अब पुलिस की हिरासत में जिन लोगों ने महीनों से अपने गांव की प्रधान कुर्सी के लिए तैयारी की थी, वे अब पुलिस की हिरासत में हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे सिर्फ चुनाव की तारीख जानने आए थे, क्योंकि अनिश्चितता के कारण उनकी चुनावी तैयारियां और राजनीतिक भविष्य अधर में लटका है। राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक तारीख घोषित नहीं की गई है, जिससे संभावित उम्मीदवारों में भारी बेचैनी है।

चुनाव नहीं तो वोट नहीं का अल्टीमेटम प्रदर्शनकारियों ने सरकार को कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने साफ कहा है कि यदि पंचायत चुनाव समय पर नहीं कराए गए, तो वे आगामी विधानसभा चुनाव में भी सरकार के खिलाफ अपना रुख अपनाएंगे। उन्होंने चुनाव नहीं तो वोट नहीं जैसे नारों के साथ अपनी नाराजगी जाहिर की है। यह चेतावनी इसलिए गंभीर है क्योंकि स्थानीय स्तर पर काम करने वाला यह नेटवर्क आगामी चुनावों में राजनीतिक दलों के लिए काफी मायने रखता है।

क्या है कानूनी स्थिति? पंचायत चुनाव में देरी का मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में भी विचाराधीन है। पिछली सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से नवंबर 2026 तक का समय उल्लेखित किया गया था, लेकिन इसे चुनावी कार्यक्रम की पुष्टि नहीं माना जा सकता। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तारीखों को भी अब तक आधिकारिक मान्यता नहीं मिली है।

अब देखना यह है कि राज्य निर्वाचन आयोग और सरकार इस बढ़ते असंतोष को शांत करने के लिए कब तक कोई ठोस कदम उठाती है। फिलहाल, यूपी के गांवों की सियासत अब राजधानी की सड़कों पर गर्म हो चुकी है।

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