नेपाल में जलप्रलय: हाइड्रोपावर साइटों पर फंसे 573 कर्मचारी, भारत ने तेज किया रेस्क्यू ऑपरेशन
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नेपाल में बीते बुधवार (26 अगस्त) को आई विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। इस आपदा में अब तक 650 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 2400 लोग अभी भी लापता हैं। रसुवा और नुवाकोट जिलों में स्थित हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स इस आपदा के केंद्र बने हुए हैं, जहां 11 प्रोजेक्ट साइटों से कुल 573 कर्मचारी संपर्क से बाहर हैं।

सुरंगों में फंसे सैकड़ों लोग बाढ़ का पानी, बर्फ और चट्टानों का मलबा लेन्डे-भोटे कोशी-त्रिशूली नदी प्रणाली में कहर बनकर टूटा। नेपाल सरकार के आंकड़ों के अनुसार, कुल 934 कर्मचारी इन साइटों पर मौजूद थे, जिनमें से 361 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है। अभी भी 573 लोग लापता हैं। इन प्रोजेक्ट्स में अपर त्रिशूली-1 (216 MW) सबसे अधिक प्रभावित है, जहां अकेले 322 कर्मचारियों का अता-पता नहीं है।

बहुराष्ट्रीय टीम के फंसने का डर लापता कर्मचारियों में बड़ी संख्या भारतीयों की है। इसके अलावा, इनमें नेपाल, दक्षिण कोरिया, चीन और जर्मनी के नागरिक भी शामिल हैं। अधिकारियों का कहना है कि यह आंकड़ा और बढ़ सकता है, क्योंकि निर्माणाधीन 5 साइटों पर ऐसे भी श्रमिक हो सकते हैं जिनका आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।

भारत का मिशन रेस्क्यू भारत ने नेपाल में बचाव कार्यों के लिए कमर कस ली है। भारतीय दूतावास ने बताया कि 11 विशेषज्ञों की एक खास टेक्निकल टीम सुरंगों में फंसे लोगों को निकालने के लिए मौके पर पहुंचकर जायजा ले रही है। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के अनुसार, भारत ने अब तक 68.5 टन राहत सामग्री भेजी है।

राहत सामग्री और बुनियादी ढांचे पर जोर नेपाल को लगातार मदद भेजी जा रही है। चौथी उड़ानों के जरिए दवाएं, जनरेटर और खाने के पैकेट पहुंचाए गए हैं। इसके अतिरिक्त, 16 ट्रकों के जरिए 230 फीट लंबे स्टील ब्रिज का सामान भेजा गया है। सात बेली ब्रिज बनाने की भी तैयारी है, ताकि बाढ़ से कटे इलाकों का संपर्क बहाल किया जा सके।

अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर बड़ा संकट यह बाढ़ न केवल मानवीय त्रासदी है, बल्कि नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ा झटका है। विशेषज्ञों का मानना है कि पुनर्निर्माण में देश की जीडीपी का 10वां हिस्सा खर्च हो सकता है। साथ ही, हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों का बढ़ना और उनके फटने का खतरा भविष्य के लिए टाइम बम जैसा है, जो नेपाल के साथ-साथ भारत के लिए भी बड़ी चुनौती है।

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