SC-ST आरक्षण पर मोदी सरकार के दो मंत्रियों में महासंग्राम , चिराग और मांझी ने एक-दूसरे से मांगा इस्तीफा
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एनडीए सरकार के भीतर आरक्षण के मुद्दे पर घमासान छिड़ गया है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच उप-वर्गीकरण (सब-कैटेगरी) और क्रीमी लेयर को लेकर तीखी बयानबाजी हुई है। दोनों नेताओं ने एक-दूसरे पर निशाना साधते हुए इस्तीफे की मांग तक कर दी है।

संतोष सुमन की मांग और विवाद की शुरुआत विवाद की शुरुआत तब हुई जब केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के बेटे और मंत्री संतोष कुमार सुमन ने आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की मांग की। उन्होंने कहा कि 22 दलित जातियों में से कुछ को ही आरक्षण का बड़ा हिस्सा मिल रहा है, जबकि मुसहर जैसे समुदाय अभी भी हाशिए पर हैं। उन्होंने तर्क दिया कि आरक्षण का लाभ सबसे जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए सब-कैटेगरी बनाना जरूरी है।

चिराग पासवान का तीखा पलटवार चिराग पासवान ने इस मांग का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने साफ कहा कि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण का आधार आर्थिक नहीं, बल्कि सदियों से चला आ रहा सामाजिक भेदभाव और छुआछूत है। चिराग ने दो टूक कहा कि अगर मांझी और उनके बेटे उप-वर्गीकरण और क्रीमी लेयर की वकालत कर रहे हैं, तो उन्हें खुद आरक्षण का लाभ लेना छोड़ देना चाहिए और अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।

मांझी ने भी दिखाए तेवर चिराग के बयान पर पलटवार करते हुए जीतन राम मांझी ने उन पर गरीबों के प्रति असंवेदनशील होने का आरोप लगाया। मांझी ने कहा कि यदि चिराग गरीब दलितों के हितों की परवाह नहीं करना चाहते, तो उन्हें कुर्सी छोड़ देनी चाहिए। मांझी का तर्क है कि आरक्षण में बंटवारा व्यापक जनहित में है, ताकि समाज के सबसे पिछड़े तबकों को उनका हक मिल सके।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और केंद्र का रुख यह पूरा विवाद सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया फैसले के बाद तेज हुआ है, जिसमें राज्यों को SC-ST आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण करने की अनुमति दी गई है। हालांकि, केंद्र सरकार ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत फिलहाल केवल ओबीसी के लिए है और इसे एससी-एसटी पर लागू करने पर अभी कोई सहमति नहीं है।

राजनीतिक गलियारों में हलचल NDA के दो अहम सहयोगी दलों के बीच का यह सार्वजनिक टकराव अब राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। जहां एक ओर विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार की घेराबंदी कर रहा है, वहीं एनडीए के भीतर बढ़ते इस मतभेद ने आने वाले समय के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। सामाजिक न्याय की इस नई लड़ाई में अब देखना यह होगा कि सरकार इस नीति पर क्या अंतिम स्टैंड लेती है।

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