परिसीमन बिल: क्या सरकार और विपक्ष के बीच बन पाएगी सहमति?
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संसद के मानसून सत्र के बीच एक 40 मिनट की मुलाकात ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी के चैंबर में जाकर उनसे मुलाकात की। इस बैठक का मुख्य एजेंडा परिसीमन बिल पर विपक्ष का समर्थन जुटाना था। ऐसी चर्चाएं हैं कि सरकार मानसून सत्र को तीन दिन (16, 17 और 18 अगस्त) के लिए बढ़ाकर इस बिल को पारित कराने की तैयारी में है।

सरकार की बेचैनी और बिल की अहमियत चार महीने पहले संसद में संख्या बल की कमी के कारण यह बिल गिर गया था। सरकार इसे दोबारा लाने के लिए इतनी गंभीर क्यों है? इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं: पहला, 2026 के बाद परिसीमन करना संवैधानिक बाध्यता है। दूसरा, महिला आरक्षण बिल का भविष्य इसी परिसीमन से जुड़ा है। अगर परिसीमन में देरी होती है, तो 2029 के लोकसभा चुनाव तक महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लागू करना मुश्किल हो जाएगा।

संख्या बल का पेंच और विपक्ष की शर्तें संविधान संशोधन बिल होने के कारण इसे पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। अप्रैल में सरकार के पास महज 298 वोट थे, जबकि 352 वोटों की दरकार थी। हालांकि, बंगाल चुनाव और अन्य समीकरणों के बदलाव के बाद अब एनडीए के पास 324 सांसदों का समर्थन है, लेकिन बहुमत के जादुई आंकड़े से वे अभी भी 36 कदम दूर हैं।

विपक्ष का रुख और प्रदर्शन राहुल गांधी ने इस मुलाकात के दौरान स्पष्ट किया है कि कोई भी चर्चा छात्रों पर लाठीचार्ज और अन्य ज्वलंत मुद्दों पर गृह मंत्री के बयान के बाद ही संभव है। कांग्रेस परिसीमन को दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व के लिए खतरा मानती है। वहीं, टीएमसी और उद्धव गुट के समर्थन के बाद सरकार की उम्मीदें बढ़ी हैं, लेकिन कांग्रेस का कड़ा रुख अभी भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।

क्या निकलेगा रास्ता? सत्ता पक्ष का तर्क है कि विपक्ष सिर्फ हंगामा कर चर्चा से भाग रहा है, जबकि विपक्ष अपनी शर्तों पर अड़ा है। शरद पवार की पार्टी और डीएमके ने संकेत दिए हैं कि अगर सभी राज्यों में सीटें 50% बढ़ाई जाती हैं, तो वे विचार कर सकते हैं। यदि ये पार्टियां साथ आती हैं, तो एनडीए के पास 354 सांसद हो जाएंगे, जो बहुमत के आंकड़े के बेहद करीब है। अब सबकी निगाहें कांग्रेस के आधिकारिक जवाब पर टिकी हैं।

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