14,200 फीट की ऊंचाई पर फिर बहाल हुआ व्यापार: भारत-चीन संबंधों में जमी बर्फ पिघली, जानें सिल्क रूट का महत्व
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गंगटोक: भारत और चीन के बीच लंबे समय से चल रहे तनाव के बाद अब रिश्तों में सुधार के संकेत मिलने लगे हैं। 6 साल की लंबी खामोशी के बाद सिक्किम स्थित नाथू ला पास (Nathu La Pass) को एक बार फिर व्यापार के लिए खोल दिया गया है। 2020 में गलवान संघर्ष और कोरोना महामारी के बाद से इस ऐतिहासिक मार्ग पर ताला लगा हुआ था।

क्या है सिल्क रूट का रोमांचक इतिहास? समुद्र तल से 14,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित नाथू ला पास सिक्किम की राजधानी गंगटोक से 54 किलोमीटर दूर भारत-चीन सीमा पर स्थित है। इसे सिल्क रूट के नाम से इसलिए जाना जाता है क्योंकि प्राचीन काल से ही यहाँ से रेशम का व्यापार होता रहा है। यह दर्रा सिक्किम को तिब्बत की चुम्बी घाटी से जोड़ता है। 1962 के युद्ध के बाद यह रास्ता बंद कर दिया गया था, जिसे 44 साल बाद 2006 में फिर से खोला गया था।

रणनीतिक और आर्थिक महत्व भले ही यहां से होने वाला व्यापार दोनों देशों की कुल अर्थव्यवस्था का एक छोटा हिस्सा हो, लेकिन कूटनीतिक रूप से यह बेहद महत्वपूर्ण है। 20वीं सदी की शुरुआत में भारत-चीन के बीच 80 फीसदी जमीनी व्यापार इसी रास्ते से होता था। यह मार्ग न केवल व्यापारियों के लिए आजीविका का जरिया है, बल्कि दोनों देशों के बीच भविष्य के बेहतर कूटनीतिक संबंधों की धुरी भी है।

अस्थिर व्यापार के उतार-चढ़ाव नाथू ला पास के जरिए व्यापार का इतिहास विवादों से प्रभावित रहा है। 2016 में यहां से 82.68 करोड़ रुपये का व्यापार हुआ था, जो 2017 में डोकलाम विवाद के कारण लुढ़ककर महज 8.86 करोड़ रुपये रह गया। साल 2019 में कोरोना से ठीक पहले 43.51 करोड़ रुपये का व्यापार हुआ। अब इसके फिर से खुलने से सिक्किम के 500 से अधिक स्थानीय व्यापारियों और ट्रांसपोर्टरों को नई उम्मीद मिली है।

रिश्तों में नॉर्मल होने की आहट विशेषज्ञों का मानना है कि नाथू ला का खुलना महज एक व्यापारिक फैसला नहीं है। अगस्त 2025 में बनी सहमति के बाद, अब सीधी उड़ानें, वीजा सेवाओं की बहाली और मानसरोवर यात्रा का शुरू होना यह स्पष्ट करता है कि दोनों पड़ोसी देश तनाव को पीछे छोड़कर सामान्य स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। यह दर्रा अब फिर से एक बार आर्थिक और रणनीतिक गलियारे के रूप में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

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