अंकित शर्मा हत्याकांड: 51 बार चाकू से गोदा, नाले में फेंका; अब सजा पाए ताहिर हुसैन को मसीहा बताने का खेल शुरू
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दिल्ली दंगे के मास्टरमाइंड को उम्रकैद वर्ष 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान आईबी (IB) कर्मचारी अंकित शर्मा की निर्मम हत्या के मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है। मुख्य आरोपी और पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत पांच दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। ताहिर के साथ नाजिम, कासिम, जावेद और अनस को भी दोषी करार देते हुए उम्रभर जेल की सजा और 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है।

क्रूरता की हदें: 51 गहरे घाव अदालत ने अपने फैसले में अंकित शर्मा की हत्या को बेहद क्रूर और बर्बर करार दिया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार, अंकित के शरीर पर कुल 51 बार वार किए गए थे। इनमें से 12 वार धारदार हथियारों से थे, जिसने उनके फेफड़ों और मस्तिष्क तक को क्षतिग्रस्त कर दिया था। रिपोर्ट बताती है कि केवल सात वार ही मौत के लिए पर्याप्त थे, लेकिन हमलावरों की नफरत और क्रूरता का स्तर इतना ऊंचा था कि उन्होंने 51 बार हमला किया।

शरीर के साथ किया गया वीभत्स व्यवहार कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि अंकित की हत्या केवल उनके धर्म की वजह से की गई। उन्हें एक उन्मादी भीड़ ने घेरा और बेरहमी से मारा। हत्या के बाद भी हमलावरों का दिल नहीं भरा; उनके कपड़े उतार दिए गए और शव को घसीटकर चांद बाग पुलिया के पास नाले में फेंक दिया गया। कोर्ट ने इसे दिल दहला देने वाला अपराध माना है।

सजा पर मजहबी मातम और अजीब दलीलें एक तरफ जहां कानून ने अपना काम पूरा किया, वहीं दूसरी तरफ ताहिर हुसैन के बचाव में एक अजीब नैरेटिव चलाया जा रहा है। सजा के ऐलान के बाद, कुछ मौलानाओं और समर्थकों ने ताहिर हुसैन को अच्छा आदमी बताना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर उसे पीड़ित बताकर सहानुभूति बटोरने की कोशिश हो रही है, जो न्यायपालिका के फैसले के खिलाफ एक सोची-समझी प्रतिक्रिया लग रही है।

परिवार का संघर्ष और सियासी घमासान अंकित के परिवार ने पिछले 6 वर्षों तक न्याय के लिए लंबा संघर्ष किया है। परिवार का कहना है कि उम्रकैद की सजा भी ताहिर के गुनाहों के मुकाबले बहुत कम है। इस पूरे मामले पर राजनीति भी तेज हो गई है। बीजेपी ने ताहिर हुसैन के आम आदमी पार्टी से पुराने संबंधों को लेकर सवाल उठाए हैं और उनसे माफी की मांग की है। वहीं, आप ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है।

आगे क्या होगा? हालांकि कोर्ट ने इसे दुर्लभ से दुर्लभतम (Rarest of Rare) की श्रेणी में नहीं रखा, जिसके चलते ताहिर हुसैन को फांसी की सजा नहीं मिली। अब ताहिर के वकील इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की तैयारी कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कपिल मिश्रा जैसे नेताओं ने मांग की है कि ऊपरी अदालत में ताहिर को फांसी होनी चाहिए। अंकित के परिवार के लिए यह न्याय की पहली बड़ी जीत है, लेकिन कानूनी लड़ाई अभी और लंबी खिंच सकती है।

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