बड़े शहरों की गगनचुंबी इमारतों और चमक-धमक भरी लाइफस्टाइल का सपना हर कोई देखता है। लेकिन, क्या ये ऊंची इमारतें वाकई सुकून देती हैं? सोशल मीडिया पर एक महिला का वीडियो वायरल हो रहा है, जिसने फ्लैट कल्चर और जमीन से जुड़े घरों की जीवनशैली पर एक नई बहस छेड़ दी है।
मुझे होती है घुटन अभिनव मिश्रा द्वारा साझा किए गए इस वीडियो में महिला अपनी सोसाइटी के सामने बसी एक बस्ती की ओर इशारा करते हुए अपने दिल की बात कहती हैं। उनका कहना है कि ऊंची इमारतों में रहने के बावजूद वे अक्सर घुटन महसूस करती हैं। उनके मुताबिक, फ्लैट की जिंदगी एक छोटी सी बालकनी तक सिमट कर रह गई है।
क्यों खो जाता है खुलापन? महिला का तर्क है कि लोग बेहतर करियर की तलाश में शहरों में आते हैं, लेकिन यहां आकर वे कंक्रीट के जंगलों में कैद हो जाते हैं। वे कहती हैं कि फ्लैट में रहने से प्रकृति से जुड़ाव खत्म हो जाता है। न तो खुला आसमान दिखता है और न ही मौसम का असली अहसास हो पाता है। खिड़की से दिखने वाला सीमित नज़ारा जीवन के उस खुलेपन को गायब कर देता है, जो एक स्वतंत्र घर में मिलता है।
आत्मीयता की कमी वीडियो में एक और महत्वपूर्ण पहलू पर बात की गई है—पड़ोसियों के बीच की दूरी। महिला का मानना है कि फ्लैट्स में रहने वाले लोगों के बीच पहले जैसा आपसी भाईचारा और अपनापन कम नजर आता है। लोग एक ही इमारत में रहकर भी एक-दूसरे से अनजान बने रहते हैं।
सोशल मीडिया पर बंटे लोग इस वीडियो के वायरल होते ही यूजर्स ने अपनी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दी हैं। कई लोग महिला की बातों से सहमत हैं और मानते हैं कि जमीन से जुड़े घरों में सुकून और आजादी ज्यादा होती है।
वहीं, कुछ यूजर्स का नजरिया अलग है। एक यूजर ने तर्क दिया कि गलियों में बने घरों की अपनी चुनौतियां हैं, जैसे पार्किंग की समस्या और पड़ोसियों के आपसी झगड़े। वहीं एक अन्य यूजर ने तंज कसते हुए कहा कि बस्ती में रहने वाले लोग खुद फ्लैट वाली आधुनिक सुविधाओं की चाहत रखते हैं।
बहरहाल, यह बहस इस सवाल को फिर से खड़ा करती है कि आधुनिकता की दौड़ में हम सुविधा के बदले कहीं अपना मानसिक सुकून तो नहीं खो रहे?
*फ्लैट और अपनी ज़मीन में क्या अंतर है ?
— Abhinav Mishra (@abhinav_blogger) July 30, 2026
इस महिला ने क्या बताया। 🤷🏻♂️ pic.twitter.com/Or2y3imnLD
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