संसद में साधु भेष पर महाभारत: पप्पू यादव के प्रदर्शन से भड़का संत समाज, बताया सनातन का अपमान
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नई दिल्ली: पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव द्वारा संसद भवन के अंदर साधु के भेष में किए गए विरोध प्रदर्शन ने सियासी गलियारों के साथ-साथ धार्मिक जगत में भी भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। राम मंदिर चंदा गबन के आरोपों को लेकर उनके इस नाटकीय प्रदर्शन को संत समाज ने सनातन परंपरा और संसद की गरिमा पर सीधा हमला करार दिया है।

संतों की कड़ी प्रतिक्रिया

अयोध्या और मथुरा के प्रमुख संतों ने इस घटना की तीखी आलोचना की है। चित्रगुप्त पीठाधीश्वर स्वामी सच्चिदानंद महाराज ने इसे शर्मनाक बताते हुए कहा कि सांसद पद की एक मर्यादा होती है, जिसे भगवा वस्त्र पहनकर राजनीतिक ड्रामा करने के लिए ताक पर रख दिया गया। उन्होंने इसे आस्था और संत समाज की भावनाओं के साथ खिलवाड़ बताया है।

भगवा त्याग का प्रतीक, राजनीति का औजार नहीं

महामंडलेश्वर विष्णु दास महाराज ने स्पष्ट कहा कि भगवा वस्त्र त्याग और तपस्या का प्रतीक हैं, न कि राजनीतिक विरोध प्रदर्शन का माध्यम। आध्यात्मिक गुरु स्वामी दीपांकर ने इस पूरे घटनाक्रम को सनातन एकता के लिए आघात बताया है। संतों का मानना है कि धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल इस तरह से करना साधु परंपरा का अपमान है।

साक्षी महाराज और अन्य संतों की कार्रवाई की मांग

भाजपा सांसद और संत साक्षी महाराज ने इसे विपक्ष की ओछी हरकत करार दिया है। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से मांग की है कि संसद के सर्वोच्च मंच की मर्यादा बनाए रखने के लिए पप्पू यादव के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, अयोध्या के संत सत्येंद्र दास वेदांती ने भी केंद्र सरकार से इस मामले में दखल देने की अपील की है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लग सके।

गरिमा का सवाल

हनुमानगढ़ी के महंत राजू दास ने सवाल उठाया है कि क्या जनप्रतिनिधियों को संसद के भीतर इस प्रकार का व्यवहार शोभा देता है? रामदल ट्रस्ट के अध्यक्ष कल्कि राम का कहना है कि जब कोई राजनीतिक व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए भगवा पहनकर प्रदर्शन करता है, तो उससे समाज में आक्रोश फैलना स्वाभाविक है।

क्या थमेगा विवाद?

संसद के मानसून सत्र के दौरान हुआ यह प्रदर्शन अब एक बड़े विवाद में तब्दील हो गया है। जहां विपक्ष इसे अपना लोकतांत्रिक अधिकार बता रहा है, वहीं संत समाज इसे सनातन आस्था का अपमान मानकर एकजुट हो गया है। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या इस विवाद के बाद संसद में प्रतीकों के उपयोग को लेकर कोई नई मर्यादा तय की जाएगी या यह सियासी रस्साकशी जारी रहेगी।

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