सार्वजनिक स्थान पर दो युवतियों के बीच हुई जोरदार हाथापाई का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। वीडियो की शुरुआत किसी तीखी बहस से होती है, जो चंद सेकंड में ही मारपीट में बदल जाती है। दोनों युवतियां एक-दूसरे के बाल खींचती हैं और धक्का-मुक्की करती हैं, जबकि आसपास मौजूद भीड़ तमाशा देखती रहती है।
मदद के बजाय कैमरों में कैद होती रही हिंसा इस पूरी घटना का सबसे चिंताजनक पहलू दोनों का आपस में लड़ना नहीं, बल्कि वहां खड़ी भीड़ का रवैया है। दर्जनों लोग वहां मौजूद थे, लेकिन किसी ने भी आगे बढ़कर बीच-बचाव करने की जहमत नहीं उठाई। इसके विपरीत, हर किसी के हाथ में मोबाइल था। लोग लड़ाई रोकने के बजाय बेहतर एंगल से वीडियो बनाने में व्यस्त नजर आए, मानो यह कोई मनोरंजन का दृश्य हो।
बाईस्टैंडर इफेक्ट और बदलती मानसिकता मनोवैज्ञानिक इस स्थिति को बाईस्टैंडर इफेक्ट (Bystander Effect) कहते हैं। इसमें भीड़ में मौजूद हर व्यक्ति यह सोचता है कि कोई और मदद करेगा, जिसका परिणाम यह होता है कि अंत में कोई भी जिम्मेदारी नहीं लेता। तकनीक के इस दौर में स्मार्टफोन ने लोगों की प्राथमिकताएं बदल दी हैं। अब लोग किसी संकट को सुलझाने के बजाय उसे सोशल मीडिया पर वायरल कंटेंट बनाने को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं।
क्या हस्तक्षेप करना हमेशा सही है? विशेषज्ञ मानते हैं कि हर स्थिति में सीधे हस्तक्षेप करना सुरक्षित नहीं होता। यदि हिंसा में हथियारों का इस्तेमाल हो रहा हो या स्थिति जानलेवा हो, तो खुद कूदना खतरे से खाली नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में पुलिस या आपातकालीन सेवा को सूचित करना एक जिम्मेदार नागरिक का पहला कर्तव्य होना चाहिए। लेकिन, जहां बिना किसी बड़े खतरे के बीच-बचाव संभव हो, वहां तमाशबीन बने रहना हमारी गिरती सामाजिक संवेदनशीलता को दर्शाता है।
समाज के लिए एक आईना यह वीडियो महज दो युवतियों के झगड़े की फुटेज नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की बदलती सोच का आईना है। आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां एक लाइक और व्यू के लिए लोग अपनी मानवीयता को दांव पर लगा रहे हैं। वायरल वीडियो तो कुछ समय बाद भुला दिया जाएगा, लेकिन यह घटना एक कड़ा सवाल छोड़ गई है—क्या हम एक संवेदनशील समाज से केवल वायरल कंटेंट के उपभोक्ता बनकर रह गए हैं?
अंततः, तकनीक हमारे हाथ में है, लेकिन इंसानियत हमारे दिल में होनी चाहिए। किसी भी संकट में हमारी पहली प्रतिक्रिया वीडियो बनाना नहीं, बल्कि सहायता के लिए आगे आना या सही कदम उठाना होनी चाहिए। यही एक स्वस्थ और सुरक्षित समाज की पहचान है।
बीच सार्वजनिक जगह पर दो लड़कियों के बीच किसी बात को लेकर जमकर हाथापाई हो गई।
— Dr.Tabassum Parveen (@Tabassum__2) July 31, 2026
सबसे दुखद बात यह नहीं थी कि दोनों लड़ रही थीं, बल्कि यह थी कि आसपास मौजूद दर्जनों लोग सिर्फ़ मोबाइल निकालकर वीडियो बनाते रहे। किसी ने आगे बढ़कर लड़ाई रोकने या समझाने की कोशिश तक नहीं की।
क्या हमारी… pic.twitter.com/KyuHn2vgBN
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