पेपर लीक माफिया का खेल खत्म: UPSC से लेकर SSC तक, अब हर परीक्षा होगी सुरक्षित , संसद से पास हुआ कड़ा कानून
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देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता बनाए रखने के लिए सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। संसद ने सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी है। लोकसभा के बाद राज्यसभा से भी इस बिल के पास होने के बाद अब देश भर में नकल माफियाओं पर नकेल कसना तय माना जा रहा है।

सिर्फ मेडिकल-इंजीनियरिंग ही नहीं, हर परीक्षा के लिए सुरक्षा कवच यह कानून केवल NEET जैसी प्रवेश परीक्षाओं तक सीमित नहीं है। इसका दायरा काफी विस्तृत है, जिसमें UPSC, SSC, रेलवे और अन्य सभी सरकारी भर्ती परीक्षाएं शामिल हैं। इस नए संशोधन का मुख्य उद्देश्य उन लाखों युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करना है जो वर्षों की मेहनत के बाद भी पेपर लीक जैसी घटनाओं के कारण पीछे छूट जाते थे।

पीएम मोदी का संकल्प: परीक्षा प्रणाली होगी और मजबूत बिल के पास होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर संदेश जारी करते हुए कहा कि सरकार विश्वस्त परीक्षा पद्धति के लिए लगातार बड़े कदम उठा रही है। पीएम ने कहा कि पिछले कई दशकों से देश पेपर लीक की समस्या से जूझ रहा था। अब इस नए कानूनी ढांचे के साथ फास्ट-ट्रैक व्यवस्था और राज्यों के सुझावों को जोड़कर इसे और अधिक पारदर्शी बनाया जा रहा है।

क्या है 2026 संशोधन की खासियत? सरकार ने 2024 में लागू किए गए मूल कानून को और अधिक सख्त बनाते हुए 2026 में यह संशोधन पेश किया है। इसका उद्देश्य नकल माफियाओं और संगठित अपराधों के खिलाफ रियल-टाइम मॉनिटरिंग और जवाबदेही को सुनिश्चित करना है। यह कानून पहले से कहीं अधिक कड़े नियमों के साथ लागू किया गया है।

सजा का प्रावधान: जेल और भारी जुर्माना नकल में लिप्त पाए जाने वाले दोषियों के लिए बेहद कठोर सजा का प्रावधान किया गया है। इसमें 5 से 10 साल तक की कैद और 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का डर, संगठित नकल गिरोहों की कमर तोड़ने के लिए पर्याप्त होगा। यह कानून मुख्य रूप से उन बड़े गिरोहों को निशाना बनाता है जो परीक्षा तंत्र को भीतर से प्रभावित करते हैं।

फास्ट ट्रैक कोर्ट का वादा: 3 महीने में फैसला न्याय में देरी न हो, इसके लिए देश के कई राज्यों में स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया गया है। नए नियमों के तहत परीक्षाओं में धांधली के मामलों की जांच 60 दिनों के भीतर पूरी की जाएगी। वहीं, स्पेशल कोर्ट को यह निर्देश दिया गया है कि वे मामले दर्ज होने के अधिकतम 3 महीने के भीतर अपना फैसला सुनाएं। दिल्ली, महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों में इस दिशा में ट्रायल भी शुरू हो चुके हैं।

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