भजन वाली जेन-जी से क्यों बौखलाया कुंठा क्लब ? जब गाली मंजूर है तो भजन पर क्यों मचे बवाल?
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सनातन संस्कृति और उससे जुड़ी हर गतिविधि के खिलाफ सक्रिय एक वर्ग, जिसे सनातन विरोधी कुंठा क्लब कहा जा रहा है, इन दिनों युवाओं के नए ट्रेंड भजन क्लबिंग को लेकर बेहद परेशान है। यह वही वर्ग है जो जंतर-मंतर पर युवाओं द्वारा की गई गाली-गलौज को तो मधुरवाणी और अभिव्यक्ति की आजादी मानता है, लेकिन उन्हीं युवाओं के भजन गाने पर उसे फिजूलखर्ची और आपत्ति नजर आने लगती है।

RTI में क्या खुला राज?

हाल ही में एक आरटीआई (RTI) के जरिए यह जानकारी सामने आई कि दिल्ली सरकार के पर्यटन विभाग ने इस साल फरवरी में दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेजों में भजन क्लबिंग के इवेंट्स आयोजित किए थे। आरटीआई के मुताबिक, इन 8 कार्यक्रमों पर कुल 1 करोड़ 83 लाख रुपये खर्च किए गए। इस खबर के बाहर आते ही तथाकथित सनातन विरोधी क्लब ने इसे सरकारी पैसों की बर्बादी करार देते हुए हंगामा खड़ा कर दिया है।

क्या है भजन क्लबिंग का क्रेज?

भजन क्लबिंग युवाओं की नई पीढ़ी यानी ‘जेन-जी’ के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा एक सांस्कृतिक ट्रेंड है। इसमें पारंपरिक भजनों और मंत्रों को आधुनिक संगीत और तेज बीट्स के साथ पेश किया जाता है। माहौल बिल्कुल किसी नाइटक्लब जैसा होता है, लेकिन धुनें आध्यात्मिक होती हैं। यह युवाओं को बिना किसी सख्त धार्मिक अनुष्ठान के अपनी जड़ों से जोड़ने का एक आधुनिक माध्यम बन गया है।

किन कॉलेजों में हुई भजन की धूम?

दिल्ली टूरिज्म एंड ट्रांसपोर्टेशन डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के तहत 10 से 19 फरवरी के बीच रामजस, दीन दयाल उपाध्याय, आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज, शहीद सुखदेव, श्याम लाल, PGDAV, शिवाजी कॉलेज और यूनिवर्सिटी स्टेडियम में ये कार्यक्रम आयोजित किए गए। विभाग का कहना है कि यह दिल्ली एज़ ए डेस्टिनेशन प्रोग्राम का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य छात्रों को भारतीय संस्कृति से परिचित कराना था।

कुंठा क्यों?

सवाल यह है कि आखिर इस वर्ग को परेशानी किससे है? जब कॉलेज के फेस्टिवल्स में फिल्मी संगीत या अन्य शोर-शराबे होते हैं, तब तो कोई विरोध नहीं होता। लेकिन जैसे ही युवा अपनी संस्कृति की ओर मुड़ते हैं और अपने अंदाज में भजन गाते हैं, तो यह वर्ग सक्रिय हो जाता है।

विश्लेषकों का मानना है कि यह वर्ग चाहता है कि युवा केवल धरना, प्रदर्शन और नकारात्मकता के भंवर में ही उलझा रहे। जब युवा अपनी जड़ों से जुड़कर चरित्र निर्माण की दिशा में आगे बढ़ता है, तो यही लोग इसे फिजूलखर्ची या फंडिंग का मुद्दा बनाकर बदनाम करने की कोशिश करते हैं।

भविष्य का निवेश या फिजूलखर्ची?

सरकारी तर्क के अनुसार, युवाओं पर किया गया यह खर्च निवेश है। यदि युवा जागरूक होगा और अपनी संस्कृति से गौरवान्वित महसूस करेगा, तो वह भविष्य में खुद एक ब्रांड एंबेसडर बनकर देश का नाम रोशन करेगा। सनातन विरोधी गैंग का विरोध इस बात का प्रमाण है कि वे नहीं चाहते कि भारत की युवा पीढ़ी अपनी वैदिक परंपराओं—जो 3000 साल पुरानी हैं—से फिर से जुड़ सके।

भजन क्लबिंग के जरिए हो रहा यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण न केवल छात्रों के आचरण को शुद्ध करने का प्रयास है, बल्कि मध्यकाल के भक्ति आंदोलनों की उस परंपरा का आधुनिक रूप भी है, जिसने कभी पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोया था।

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